ऐसे ही नहीं हुए मर्यादा पुरुषोत्तम राम
| Agency - 25 Mar 2018

चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी को भगवान राम का जन्मोत्सव मनाते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-
नौमी भौमवार मधुमासा, अवधपुरी यह चरित प्रकासा। 
जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं, तीरथ सकल तहां चलि आवहिं।
अर्थात्  तुलसीदास जी ने अपने प्रबंध काव्य रामचरित मानस की रचना उसी दिन प्रारम्भ की थी जिस दिन वेदों में श्री राम के जन्म की बात कही गयी है। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है- भए प्रगट कृपाला अर्थात् प्रभु श्रीराम प्रकट हुए थे। मनु और शतरूपा को परब्रह्म ने वरदान दिया था कि तुम्हारे पुत्र के रूप मंे जन्म लूंगा। इसलिए भगवान को मानव के रूप मंे अवतरित होना पड़ा लेकिन इस रूप मंे भी भगवान राम ने मर्यादा की जगह-जगह स्थापना की। इसीलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया। भगवान ने नर रूप मंे अवतार क्यों लिया, इसके बारे मंे भगवान शंकर पार्वती जी को बताते हैं- हरि अवतार हेतु जेहि होई, इदमित्थं कहि जाइ न सोई। अर्थात् श्री हरि का अवतार किस कारण होता है, वह कारण बस यही है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसलिए अनेक कारण हो सकते हैं और ऐसे कारण भी जिनको कोई जान नहीं सकता। शंकर जी ने कहा कि इसके बावजूद संत, मुनि, वेद-पुराण अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार जैसा कुछ कहते हैं और जैसा कुछ मेरी समझ में आता है, वही कारण मैं बता रहा हूं। शंकर जी ने पार्वती जी से कहा कि जब-जब धर्म का ह्रास होता है और नीच-अभिमानी, जिन्हंे राक्षस कह सकते हैं, उनकी संख्या बढ़ जाती है, तब कृपानिधान प्रभु भांति-भांति के शरीर धारण करते हैं। प्रभु असुरों को मारकर देवताओं (लोक कल्याण) को स्थापित करते हैं और वेदों की मर्यादा की रक्षा करते हैं। इस प्रकार भगवान शंकर ने श्रीराम के नर रूप मंे अवतार लेने की कुछ कहानियां भी पार्वती जी को सुनाई थीं। इनमंे नारद का मोह ग्रस्त होकर प्रभु को श्राप देना, महाअसुर जालंधर को छल से मारकर देवताओं का कल्याण करना, मनु-शतरूपा को उनके पुत्र के रूप मंे पैदा होने का वरदान देना, अपने द्वारपाल जय और विजय तथा राजा प्रताप भानु को राक्षस योनि से मुक्ति देने की कहानियां शामिल हैं। 
महाराजा मनु और उनकी महारानी शतरूपा ने जब अयोध्या मंे राजा दशरथ और महारानी कौशल्या के रूप मंे जन्म लिया तो भगवान को नर लीला करने का अवसर अनुकूल लगा क्यांेकि भगवान के दोनों द्वारपाल जय और विजय तथा राजा प्रताप भानु ने तब राक्षसराज रावण के रूप मंे जन्म लिया था और राक्षस कुल मंे पैदा होने से वह तरह-तरह से अत्याचार कर रहा था। देवता और ऋषि मुनि रावण के अत्याचार से अत्यंत दुखी हुए। पृथ्वी तो यहां तक कहने लगी कि मेरे ऊपर इतना भार है लेकिन उससे उतनी परेशानी नहीं होती जितना अकेले रावण का भार होने से हो रही है। देवताओं ने और ऋषि मुनियों ने सामूहिक रूप से प्रार्थना की, हे प्रभु अब आप ही हमंे इस महादुष्ट से मुक्ति दिला सकते हैं। भगवान  श्री नारायण को तो कई कार्य एक साथ सम्पन्न करने ही थे, इसलिए चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी को वह महाराजा दशरथ के पुत्र के रूप मंे अवतरित हुए। गुरुदेव वशिष्ठ ने उनका नाम राम रखा- सो सुखधाम राम असनामा, अख्लि लोकदायक बिश्रामा।
इस प्रकार ‘विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार’ लेने वाले श्रीराम को मर्यादा का स्वयं पालन करके विश्व भर को मर्यादा का पाठ पढ़ाना था। वे जब छोटे थे, तभी अपने तीन अन्य भाइयों के साथ प्रातःकाल उठकर अपने माता-पिता को प्रणाम करते थे। आज के समाज मंे माता-पिता के प्रति सम्मान की यह भावना क्षीण होती जा रही है लेकिन श्रीराम ने आचरण करके दिखाया- प्रातकाल उठि कै रघुनाथा, मातु पिता गुरु नावहिं माथा। प्रभु श्रीराम ने भाइयों के साथ गुरु वशिष्ठ के आश्रम मंे शिक्षा प्राप्त की। उसी समय विश्वामित्र मुनि को आश्रम मंे यज्ञ आदि करने पर राक्षस परेशान करते हैं और ऋषि राजा दशरथ के पास राम और लक्ष्मण को अपने साथ ले जाने के लिए आते हैं। राजा का धर्म है कि उसके राज्य मंे किसी को परेशानी है तो उसे दूर करे, इसी मर्यादा का पालन करने प्रभु श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ जाते हैं और राक्षसों का संहार करते हैं। विश्वामित्र जी राम और लक्ष्मण को दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान करते हैं और राजा जनक के धनुष यज्ञ को दिखाने ले जाते हैं।
राजा जनक अपनी पुत्री सीता के विवाह के लिए एक प्रतिज्ञा किये हैं कि जो कोई शंकर जी के धनुष को तोडे़गा, उसी से सीता का व्याह करेंगे। श्रीराम-लक्ष्मण फूल लेने वाटिका मंे गये, तो वहां सीता को देखा। किशोरावस्था मंे विपरीत लिंगी प्रेम स्वाभाविक है। सीता जी वैसे भी परब्रह्म की परम शक्ति हैं। फिर भी नर लीला मंे श्रीराम मर्यादा का पालन करते हुए अपने प्रेम की बात गुरु विश्वामित्र को भी बता देते हैं। राजा जनक की प्रतिज्ञा पूर्ण करते हुए श्रीराम सीता से विवाह करते हैं। विवाह के बाद अयोध्या मंे राजा दशरथ उनको युवराज बनाने की तैयारी करते हैं, तभी उनकी चचेरी माता कैकेयी अपने पुत्र भरत के लिए राजगद्दी और राम को 14 वर्ष का वनवास देने का वरदान मांगती हैं। अपने पिता के असमंजस को दूर करते हुए श्रीराम किसी प्रकार की शिकायत नहीं करते। उनके छोटे भाई लक्ष्मण नाराज होते हैं लेकिन उन्हें भी श्रीराम मर्यादा सिखाते हुए चुप करा देते हैं। वनवास जाते समय गंगा नदी पार करते हुए भी श्रीराम अपने पिता के मंत्री सुमंत्र से कहते हैं कि लक्ष्मण की बातों को अयोध्या मंे न बताना। अपनी चचेरी माता कैकेयी के प्रति तो वे अतिरिक्त स्नेह हमेशा ही दिखाते रहे ताकि उन्हंे किसी प्रकार की ग्लानि न हो।
इसके बाद प्रभु श्रीराम नर लीला करते हुए नारद के श्राप को पूरा करते हैं। रावण सीता का हरण करता है और नारि विरह मंे वे विरही बन जाते हैं। किष्किंधा पर्वत पर हनुमान जी से भेंट होती है और महाबलि बालि ने अपने छोटे भाई के प्रति जो अक्षम्य अपराध किया था, उसका दण्ड देते हैं। सुग्रीव अपने वानरों की विशाल सेना को सीता की खोज मंे भेजता है। हनुमान जी लंका मंे जाकर सीता जी से मिलते हैं और आश्वासन देते है कि शीघ्र ही प्रभु श्रीराम वानर-भालुओं की सेना लेकर आएंगे। प्रभु श्रीराम समुद्र पर पुल बांध कर लंका पहुंचते हैं और रावण को हर प्रकार से समझाते हैं कि युद्ध किसी भी स्थिति मंे अच्छा नहीं होता। कदम-कदम पर मर्यादा का पालन करते हुए प्रभु श्रीराम रावण की विशाल सेना का संहार करते हैं। उसका महापराक्रमी बेटा मेघनाद और भाई कुंभकर्ण मारा जाता है। रावण का तीसरा भाई विभीषण श्रीराम की शरण मंे आ गया था, उसे लंका का राज्य सौंप कर प्रभु श्रीराम अयोध्या वापस आते हैं और माना जाता है कि लगभग 10 हजार वर्ष तक राज्य किया। उनका शासन इतना अच्छा था कि आज भी राम राज्य स्थापित करने का संकल्प लिया जाता है। 


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