कोरोना से डरो ना..... श्रमिकों का योगदान भूलो ना!
| Agency - 03 Apr 2020

कोरोना का व्हायरस हजारों की मौत ला सकता है, यह प्रचारित होते ही समझ में आ गयी बात कि भारत में भी कितने लोग मौत से डरते है.... उनकी जिंदा रहने की जीजीविषा को सलाम! लेकिन जैसा कि छोटी, sponsored विज्ञापन डाक्यूमेंट्रीज में आजकल कोरोना का रूप, हल्ला और जिंदगी का अंत दिखाया जाता है वैसा हमारी कोख में से या गद्दी के नीचे से निकलने वाला नहीं है यह व्हायरस! और इसे नया व्हायरस COVID-19 याने 2019 में जन्म लिया हुआ बताकर एक अ-भूत हमले का, संकट का डर पैदा किया जा रहा है, लेकिन वह इतना नया भी तो नहीं है| इसका वर्णन, इसी नाम से, कुछ साल पूर्व की किताबों में भी तो दिया हुआ है|..... और इसे जुकाम का एक किस्सा या viral बीमारियाँ, जो अब सब को परिचित हैं, उसी में से एक मानकर चलो, यह भी कई डॉक्टर्स, दुनिया भर के बता रहे है| फिर भी भारत के करोड़ों को घेर सकता है, अब दूसरी-तीसरी और चौथी फेज याने दौर चल रहा है तो 24 घंटे में फ़ैल सकता है – ये तमाम घोषणाएँ या चेतावनी निश्चित ही किसी को हिम्मत नहीं दे रही, इस नये संकट से झूलने और लड़ने का! बात तो हो रही है, इसे स्वीकारो, डरो और लॉकडाउन करो, खुद को और हमारी अर्थव्यवस्था यह अब इस नतीजे पर पहुंचा है कि हमारी आपसी लेन देन ही क्या, मिलनसार होना, हाथ से हाथ मिलाना इत्यादि भी अब थम सा गया है| जब कि देशभर आया था उभार, एक दूसरे के गले लगाने के ऐलान का! माहौल बन चुका था आजादी का और अचानक यह गुलामी का फंडा फतवा आया, हमने मान भी लिया| राष्ट्रभक्ती के निशान, ऐलान या कारस्थान, उसे नकारना ही क्या, नाफरमानी जैसे धि:क्कारना भी बहुत कम लोग करते है, इसीलिए तो हम हर प्रदेश में चल रहे थे जो, उन ‘आजादी’ के नारे और मोर्चों को भी राष्ट्रभक्ति का ही पैगाम मानते थे| कोरोना ने मानो ऐसे सभी पंडाल्स गिराये| किन्तु एक ओर एक दिन का जनता कर्फ्यू ही घोषित कर पाये थे प्रधानमंत्री, क्योंकि थोपने का आदेश बुरी प्रतिक्रिया, तीखे हमले ला सकता था| मात्र धीरे-धीरे यहाँ का मौसम बदलता गया है... अब हर कोई इस डर से घर में ही घुसकर बैठता गया है| क्या यह सच है? या मात्र ‘मीडिया’ लाया है यह असर – एग्जिट पोल जैस इस पूरे व्हायरसी संकट के फैलने या फैलाने की हकीकत क्या एक साजिश है? अमरीका और चीन के बीच चलते आ रहे बाजार युध्द का नतीजा है? एक दूसरे को हराने की ख्वाहिश महँगी पड़ी है या मंजिल तक पहुंची है? अमरीका ने इंग्लैण्ड से निकलकर अपनी स्थापना करने के लिए मूल निवासियों को हटाकर भूमि काबिज की थी, तब भी ब्लेंकेटस में विषारी जीवाणु को छोड़कर उन कंबलों में, उन्हें नष्ट किया गया था| आदिवासियों की भूमी, हड़पकर बने राष्ट्र ने फिर स्वतंत्रता, आजादी और समता तक की बात मूल्यों के रूप में दुनिया के सामने रखी थी| वाशिंगटन में अब्राहम लिंकन की भव्य प्रतिमा के इर्दगिर्द में शिल्पित उनके बोल जो sound and light show के बदले एक अनोखा प्रकाश सींचते है, उससे मेरा भी अंतरंग उज्जवलित हुआ था, वह याद आये! उसी अमरीका के ट्रम्प अब नये-नये खेल खेल रहे है.... और भारत के सत्ताधीश उनका स्वागत कर रहे है| यहाँ के मूल निवासी इस ट्रम्प-कार्ड के खेल के सामने चूप है क्योंकि हमारे राष्ट्रनेता, चुने हुए, मनमानी करते हुए कभी रशिया तो कभी अमरीका और कभी चीन का हाथ पकड़ने का अनुभव हमारे लिए कोई नया नहीं है| और उनके आपसी स्पर्धा, टकराव, या युध्द से भी हमारी बहुसंख्य जनता का न कोई ताल्लुक है, न हि उससे कभी मिली है तसल्ली भी! तो चलती रही है, हमारे पक्ष में या विपक्ष में भी दी गयी चुनौतियाँ... और हम, झेलते हुए हमारे सपने साकार होने की ऊँची डगर चढ़ते रहे है, चढ़ते रहे है| आज फिर वही समय के मोड़ पर खड़े है हम!

          ‘समय का मोड़ कह रही हूँ इसलिए क्यों कि पिछले सालों या पीढ़ियों से हम सबने जो भी भुगता है उसकी सूची में भी यह अनोखा है, हादसा| इसे मात्र प्राकृतिक कहना भी मुश्किल है, और मानवीय भी| अमानवीय रूप से व्यवस्था को अव्यवस्था करने से जो उभरी है, वह है अराजकता! इससे कौन-कौन लाभ पा रहे है, इसका हिसाब तो बाद में ही सामने आएगा| आज मात्र दलित, आदिवासी, मजदूर और किसान भी निश्चित ही नुकसान भुगत  रहे है| दिल्ली में और गुजरात में या कही मध्य प्रदेश में किसानों की फसलें – फल सब्जी की, खेत में या मंडी में सड़ रही है| केला 400 रू. क्विंटल याने घाटे के दाम में बेचना पड रहा है| लाखों रु. कीमत की किसी की सब्जी, किसी का टमाटर तो किसी का चना भी फंसा है खेतों में| मजदूरों को लेकर आने वाले व्यापारी हिचकिचा रहे है या न जाने दाम कम देने के लिए देरी कर रहे है| गाड़ियों से खेत उपज ले जाने के लिए कई किसानों की क्षमता नहीं तो सड़ रहे टमाटर, सब्जियाँ और केले भी! कुछ बांटने पर भी सभी गरीब नहीं पा रहे है लाभ| एक ओर राशनिंग की व्यवस्था में अंधाधुंधी, बाजार बंदी, रोजगारबंदी आदि से भूखमरी और दूसरी ओर इस सकस आहार की बरबादी – कैसे सहन करें हम?जरूरी है इस पर आवाज उठाना! सुनवाई तो है ही नहीं, आज की इमरजेंसी में| जैसे कश्मीर में, वैसे पूरे देश में आज दबी हुई है जनतंत्र की मांग| इस स्थिति में हमें कुछ राह जरूर देखनी पड़ेगी और मानेंगे कि फिर उठेगी आजादी की मांग या जंग भी! लेकिन तब तक क्या हम देखते रहेंगे?

 हमें सोचना चाहिए, जो हो रहा है, उससे निकले निष्कर्षों पर! पहले तो रास्ते पर उतर आये लाखों श्रमिकों के बारे में| ये अन्यथा छुपे रहते है, शहरों की चमक धमक के पार! इनके श्रम नहीं गिने जाते, नहीं माने जाते| ‘गरीबों का श्रम कितना, हक कितना? हिसाब करो, हिसाब दो!’ की घोषणा मुंबई में हमारे ‘घर बचाओ-घर बनाओ आंदोलन’ की आवाज बन गयी थी, वह इसी कारण| इन्हें न आवास, न शिक्षा, न सबको राशन, न कायमी रोजगार! स्थलांतरित याने अंधातरी टंगे रहते है ये सब! अपनी गावों में जड़े बाकी कायम रखते है| लेकिन उखड़ते जाते रहते है, हर साल 4 से 6 महीनों तक! कहाँ होता है पालन इनके हक में बने कानूनों का? अब तो बने बनाये कानूनों की वापसी हो रही है| इसे चुनौती देने वाले श्रमिकों के संगठनों का मुँह व्हायरस के चलते| लॉकडाउन है तो उसकी खिलाफत भी नॉकडाउन होगी ही|

इन श्रमिकों के पैदल चलकर आने की बात मैंने अहमदाबाद में रहते, पाल्डी से चलकर पंचमहाल जिले में 200/300 किमी वापस – लौटने वाले श्रमिकों की दुखद हकीकत के रूप में देखी थी| लेकिन आज लाखों का लौटना जो संदेश दे रहा है, वह है गाँधी जी के हिन्द स्वराज का! रोजगार स्थानिक संसाधनों से ही स्थानिक इकाई में पाना है, तो इन श्रमिकों का स्वागत होना चाहिए| टेस्ट होगी, केवल कोरोना की नहीं “काम दो ना” इस आक्रोश की! जो रोजगार ग्यारंटी के कानून के बावजूद नहीं होता है – नहीं हर हाथ को काम, नहीं काम का सही दाम! वही लाता है स्थलांतर! अब कोरोना का डर चला जाने के बाद भी आसानी से फिर शहरों में, बड़े बड़े महलों में या दूर खेतो – फक्टरियों में नहीं जाएंगे मजदूर, अपने गाँव से दूर, बाल बच्चों के साथ! तो अब इन श्रमिकों को गाँव-गाँव में रोजगार देना क्या असंभव है? रोजगार के कई सारे अवसर हो सकते है लेकिन तात्कालिक स्थिति में जरूरी है जलसंवर्धन और भूरक्षा के कार्य! गड्डे खोद के रखे तो बारिश में हो सकता है पौधारोपण! आज के रोज जरूरी है हर खेत में तालाब, हर खेत को मेढ़ से बांधना| ऐसे बंधनिर्माण से बहने से बचेगी मिट्टी| गाँव में ही खेतउपज से संभव है कई प्रकार के उद्योग| सब्जी सूखाने से लेकर टमाटर से सॉस या केले के चिप्स बनाना, छिलके से कागज और मिर्च से पावडर बनाना भी| गाँव में ये कार्य उपलब्ध न करने से हमें नहीं संवार सकेंगे इन श्रमिकों का श्रम, नहीं दिला पाएंगे उनका हक| हाँ, कुछ त्याग तो श्रम लेने वालों से भी होना पड़ेगा| न्यूनतम वेतन बढ़ाने से, कम होगी थोड़ी सी गैर बराबरी| शादी – ब्याह – नुक्ता का खर्च थोडा कम होगा, धनिकों का| बड़े, नये आवास थोड़े सादगी के बनेंगे और स्थानीय संसाधनों की मर्यादा में भी| लेकिन अमर्याद होगी रोजगार की ग्यारंटी और स्व – राज की भी! हर गांववासी के लिए अब मानो चुनौती है| अपने गाँव से बहता पानी, अपनी भूमि से साथ, श्रमशक्ति का भी अंदाज लिया जाये| शिक्षित, अशिक्षित युवा, महिला और कुशल – अकुशल श्रमिकों की शक्ति का सर्वेक्षण करे, घर गाँव में आकर रुके युवा साथी| इन सब के श्रम और कुशलता को संसाधनों से जोड़कर गाँव की अर्थव्यवस्था में समाना, यही सही परिवर्तन ला सकता है| स्थलांतर के कई असरों से बचेगा देश| श्रमिकों के श्रम की लूट, उनके बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य प्रभावित होने का असर होता है, मजदूर बने रखने वाला दुश्चक्र| ऐसे 40% श्रमिक जो दूरदराज जाते रहते है, पेट पालने बच्चों को पोसने के लिए, वे अब अपनी श्रम की पूंजी शहरों का विकास या कंपनियों का कारोबार और मुनाफा बढ़ाने में नहीं लगायेंगे, ठेका मजदूरी भी रोक देंगे, तो निश्चित होगी परिवर्तन की शुरुआत! गैरबराबरी पर हमला नहीं तो कम से कम सोचविचार सही!                  

 

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