शीतयुद्ध में फिर फँस गया रूस
| Agency - 28 Mar 2018

एक समय था जब पूरी दुनिया दो ध्रुवों में बंटी थी। एक का नेतृत्व सोवियत संघ कर रहा था और दूसरे का मुखिया था अमेरिका। दो विश्वयुद्धों की विभीषिका को झेल चुके छोटे-बड़े सभी राष्ट्रों ने मिलकर संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना की थी लेकिन पांच राष्ट्र ही अपने को नायक मान रहे थे। रूस, अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैण्ड और चीन इन्हीं देशों ने अपने पास सुरक्षा परिषद में वीटों रखा। ऊपरी दिखावे के लिए दुनिया की यह पंचायत बन गयी लेकिन रूस और अमेरिका ने अपने-अपने सैन्य संगठन बनाकर दादागिरी कायम कर ली। लड़ाकू देशों के टुकड़े करके इन दोनों ने आपस में बांट लिया- मसलन जर्मनी के दो टुकड़े किये और कोरिया को दो भागों में बांटा। दोनों देशों ने एक एक टुकड़े पर अपना हाॅथ रखा। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का शीत युद्ध का जो 90 के दशक तक चलता रहा। इस बीच अमेरिका अपनी रणनीति में सफल रहा और उसने रूस के छोटे-छोटे देशों को आजादी दिलाने में अप्रत्यक्ष भूमिका निभाई। सोबियत संघ बिखर कर सिर्फ रूस रह गया। इसके बावजूद कहते है कि हाॅथी लाख बीमार हो लेकिन सवा मन का रहता ही है। यही स्थिति रूस की है। आज भी सामरिक रूप से वह अमेरिका को टक्कर देने की क्षमता रखता है। इसीलिए एक बार फिर उसे शीत युद्ध में फंसा दिया गया है और इसके पीछे अमेरिका के डोनाल्ड ट्रम्प हैं जो ब्लादिमिर पुतिन को अपना मित्र कहते हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि सब कुछ अचानक हुआ है क्योंकि सीरिया में अमेरिका जहां राष्ट्रपति असद का विरोध करने वालों का पक्ष ले रही थी, वहीं रूस राष्ट्रपति असद की मदद कर रहे थे। इसी तरह ईरान की सामरिक प्रगति अमेरिका को चुभती है लेकिन रूस उसकी मदद कर रहा है। उत्तर कोरिया को मिसाइल के क्षेत्र में अमेरिका आगे बढ़ने नही देना चाहता लेकिन रूस और ईरान उसकी मदद कर रहे हैं। इसी तरह चीन से भी अमेरिका खतरा महसूस करता है लेकिन रूस उसे अपना साम्यवादी परिजन मानता है। इस तरह के कई मामले हैं जो रूस और अमेरिका के बीच शीतयुद्ध का कारण बनते हैं लेकिन पिछले वर्ष अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प की मदद करने का आरोप भी रूस के नेता पुतिन पर लगा है। साइवर जासूसी करने वाले एक रूसी नागरिक को पकड़ा भी गया लेकिन श्री पुतिन ने कहा कि रूस के नागरिक के पकड़े जाने से यह कैसे साबित होता है कि रूस ने जासूसी करायी है। मामले की कड़िया आगे भी मिलने लगी ब्रिटेन में पूर्व रूसी जासूस पर केमिकल अटैक किया गया। ब्रिटेन ने आरोप लगाया कि यह हमला रूस ने ही कराया है। इसके बाद अमेरिका ने 60 रूसी राजनयिकों को निष्कासित करने का आदेश जारी कर दिया। डोनाल्ड ट्रम्प लगता है इस तरह की घटना का इंतजार ही कर रहे थे। चार मार्च 2018 को रूस के पूर्व जासूस सर्गेई स्क्रिपल और उनकी बेटी यूलिया पर नर्व एजेन्ट (केमिकल) से हमला होना कोई अनोखी बात नहीं थी लेकिन अमेरिका ने जब यह कहा कि रूस ने इंग्लैण्ड में एक ब्रिटिश नागरिक और उनकी बेटी को मारने के लिए सैन्य श्रेणी के नर्व एजेन्ट का इस्तेमाल किया और यह हमला हमारे सहयोगी ब्रिटेन पर किया गया तो इस पर हम (अमेरिका) खामोश नहीं रह सकते।
अमेरिका ने रूस को अपने शिकंजे में पूरी तरह जकड़ने के बाद ही इस प्रकार की कार्रवाई की है। यूरोपीय यूनियन के नेता भी इस बात को लेकर सहमत हो गये थे कि दक्षिणी  इंग्लैण्ड में पूर्व रूसी जासूस सर्गोई स्क्रिपल और उनकी बेटी यूलिया पर हमले में रूस का ही हाथ है। ब्रिटेन के विदेशमंत्री बोरिस जाॅनसन कहते हैं कि यह असाधारण अन्तर राष्ट्रीय प्रतिक्रिया है और हमारे सहयोगी देशों ने रूसी राजनयिकों को निष्कासित करके ऐतिहासिक कार्य किया है। अमेरिका का कहना है कि नर्व एजेन्ट से हमला अन्तर राष्ट्रीय नियमों और केमिकल वेपन कन्वेंशन का उल्लंघन है। अमेरिका ने कितनी ठोस रणनीति बनायी है, इसका पता इससे चलता है कि दर्जन भर से ज्यादा राष्ट्र रूस को जासूसी कराने वाला देश मानने लगे हैं इस क्रम में उक्रेन ने 13 रूसी नागरिकों को देश छोड़ने का आदेश दिया। उक्रेन के अलावा पोलैण्ड ने 4, फ्रांस ने 4, जर्मनी ने 4, कनाडा ने 4, चेकरिपब्लिक ने तीन, लिथुआनिया ने 3, नीदर लैण्ड ने 2, इटली ने 2, डेनमार्क ने 2, एस्टोनिया, लातविया, क्रोआटिया, फिनलैण्ड और रोमानिया ने भी एक-एक रूसी राजनायिक को देश छोड़ने का आदेश देने की घोषणा कर दी है। इससे इतना तो साफ है कि रूस और पश्चिमी देशों के बीच जमकर शीतयुद्ध चल रहा है। रूस के खिलाफ ब्रिटेन के साथ 14 यूरोपीय देश और अमेरिका का आना कोई मामूली बात नहीं है। ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ से अपना नाता भी तोड़ लिया है, इसके बावजूद यूरोपीय देश ब्रिटेन का साथ दे रहे हैं। ब्रिटेन ने इस मामले में पहल की और स्क्रिपल व उनकी बेटी की हत्या के प्रयास के बाद ही 23 रूसी राजनयिकों को अपने देश से निकालने का आदेश दिया था। रूस ने इस पर प्रतिक्रिया जताते हुए कहा था कि हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे और रूस ने भी अपने यहां से ब्रिटेन के 23 राजनयिकों को बाहर कर दिया था। रूस अपने ऊपर लगाये गये आरोपों को खारिज कर कहा है उसका कहना है कि ब्रिटेन ने जो आरोप लगाये हैं, उनके बारे में पुख्ता सबूत पेश करे। रूस ने ऐसी ही सफाई अमेरिका को भी दी थी लेकिन न तो अमेरिका को विश्वास हुआ था और न ब्रिटेन को हो रहा है। इससे रूस और पश्चिमी देशों के बीच पुरानी कटुता की याद फिर ताजा हो गयी है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और रूस के राजनीतिक और आर्थिक हितों का टकराव शुरू हुआ था। दोनों के बीच अपनी अपनी प्रभुता बढाने की होड़ लग गयी। एक समय था जब रूस ने अफगानिस्तान पर अपना कब्जा कर लिया था, तब अमेरिका ने ही रूस के खिलाफ लड़ने के लिए तालिबान खड़े कर दिये थे जो आज अमेरिका के लिए ही मुसीबत बने हुए हैं। पूरी दुनिया 1990 तक रूस और अमेरिका के बीच बंटी रही लेकिन अमेरिका ने सोवियत संघ का विखण्डन करने में सफलता प्राप्त कर ली। रूस इस बात को कभी भूल भी नहीं सकता। शीतयुद्ध के समय जब तत्कालीन सोवियत संघ और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर था, तब राजनयिक निकाले जाते थे। अब रूस के राजनयिकों का इतनी बड़ी संख्या में निकाला जाना और रूस की तरफ से जवाबी कार्रवाई होना यही साबित करता है कि रूस के सामने शीत युद्ध जैसी स्थिति फिर से शुरू हो गयी है। परमाणु युद्ध की आशंका से दोनों ही देश कभी भी  सीधे तौर पर एक-दूसरे से नहीं भिड़े लेकिन जापान मे बम गिराये जाने के बाद पूरी दुनिया आशंका से ग्रस्त तो हो ही चुकी थी। यह आशका अभी निर्मूल नहीं हुई। अब तो परमाणु बम कई छोटे-छोटे देशों के पास भी हैं। इसके अलावा आतंकवाद भी लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस भी इसका शिकार हो चुके है। सवाल उठता है कि अमेरिका और रूस के बीच फिर से शीतयुद्ध गहराने से आतंकवाद और परमाणु युद्ध की आशंका को कैसे खत्म किया जा सकेगा।


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