क्यों जरूरी है यूपीकोका?
| Agency - 29 Mar 2018

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक, उत्तर प्रदेश (यूपी कोका) को एक बार फिर से विधानसभा में पारित करा लिया है। पिछले साल दिसम्बर में भी इस कानून को विधानसभा मंे पारित कराया गया था लेकिन विधान परिषद में विपक्षी दलों का बहुमत होने से यह विधेयक पारित नहीं हो सका था। इसलिए सवाल उठाया जाता है कि अपराध नियंत्रण के लिए इस प्रकार का कानून बनाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? यह सवाल आम जनता के मन में भी उठता है। विपक्षी दल भ्रमित करने का प्रयास करते हैं और सत्तारूढ़ दल भी जनता की भाषा में इसे समझा नहीं पा रहे हैं। इस विधेयक का मूल उद्देश्य अपराधियों में भय पैदा करना है। उत्तर प्रदेश ही नहीं देश के अन्य प्रदेशों में भी जब तब इस प्रकार की घटनाएं सुनाई पड़ती हैं कि अराजक तत्वों ने बाजार में आग लगा दी, दुकानें जला दीं और वाहन फूंक डाले। पश्चिम बंगाल के रानीगंज में रामनवमी जुलूस के दौरान हिंसा हो गयी और दो लोग मारे गये। इसी तरह बिहार के होशंगाबाद में हिंसा की वारदात हुई। हत्या, छिनैती जैसी वारदातों मंे पकड़े गये लोगों के बारे मंे पता चलता है कि ये जमानत पर छूटे थे अथवा किसी पुराने विवाद में जेल से रिहा हुए।
ये ऐसे अपराधी हैं जिनकी प्रवृत्ति नहीं बदलती और गुण्डों-बदमाशों की वे फौज बना लेते हैं। सामान्य भाषा मंे हम इन्हें माफिया कहते हैं। इनके खिलाफ सामान्य रूप से कोई बोलने को तैयार नहीं होता और यदि किसी ने साहस करके आवाज उठाई तो उसकी जुबान हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर दी जाती है। ऐसे लोगों को राजनीतिक ही नहीं विधाई संरक्षण भी मिलता है। वे किसी मामले में थाने में देर से पहुंचते हैं, उनकी जमानत के लिए वकील पहले ही पहुंच जाते हैं। इसलिए ऐसे बदमाशों के लिए विशेष कानून बनाया जाना बहुत जरूरी है। महाराष्ट्र जैसे राज्य में मकोका के नाम से इस प्रकार का कानून पहले से चल रहा है। उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने अपने संकल्प पत्र मंे वादा किया था कि भ्रष्टाचार और गुण्डाराज का खात्मा किया जाएगा। अपराधों को खत्म करना इतना आसान नहीं होता है।
उत्तर प्रदेश मंे भाजपा की सरकार बन गयी तो उसे अपने वादे पूरे करने के लिए कदम उठाना जरूरी हो गया था। योगी आदित्यनाथ को जब मुख्यमंत्री बनाया गया तो पूर्वांचल मंे उनकी जो छवि थी, उसी के अनुरूप नौकरशाही पर उसका प्रारंभिक असर पड़ा। योगी जी कितने बजे जगते हैं, कितने बजे सोते हैं और काम ठीक से न करने वालों के प्रति उनका कैसा रवैया रहता है, इस पर खूब चर्चा हुई। यह वही समय था जब पुलिस-प्रशासन ने बिना किसी निर्देश के प्रदेश भर मंे बिना किसी अनुमति के चल रहे पशु काटने के अड्डे (स्लाटर हाउस) बंद करा दिये। गुंडों पर नियंत्रण के लिए एंटी मजनू अभियान चलने लगा। स्कूलों के सामने गली-चैराहों पर बिना मतलब खड़े युवाओं को पुलिस का रौद्र रूप दिखने लगा था लेकिन माफियाओं ने कुछ दिन खामोश रहकर अपने सरपरस्तों के साये मंे फिर वही हरकतें शुरू कर दीं। योगी आदित्यनाथ की सरकार ने शातिर बदमाशों को चेतावनी भी दी थी कि ‘अपराध छोड़ दो अथवा प्रदेश छोड़ो’। इसके साथ ही पुलिस को हर कीमत पर बदमाशों को पकड़ने का निर्देश दिया गया। इस प्रक्रिया मंे कितने ही बदमाश मारे गये। एनकाउंटर का इतिहास बन गया।
इसके बाद भी कई अपराधी अपनी गर्दन बचाने में सफल रहे क्योंकि उनके पास मजबूत सुरक्षा तंत्र है, उनके पास मजबूत ढाल है और सामान्य कानून उनकी गर्दन तक नहीं पहुंच पाते हैं। ऐसे लोगों से निपटने के लिए ही योगी आदित्यनाथ की सरकार दिसम्बर 2017 में ही यूपीकोका लेकर आयी थी। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार इस कानून का दुरुपयोग विरोधी दलों के लोगों को फंसाने के लिए करेगी। आशंका जताना विपक्षी दलों का अधिकार है लेकिन संगठित अपराध करने वालों से कैसे निपटा जाए इसका कोई ठोस जवाब नहीं है। वे कहते हैं कि पहले से ही ऐसे कानून है, जिनसे अपराधियों को शिकंजे मंे लिया जा सकता है। इस पर यह सवाल भी किया जा सकता है कि यदि पुराने कानून सक्षम हैं तो उनकी सरकारों के दौरान संगठित अपराधों पर रोक क्यों नहंी लगायी जा सकी? योगी की सरकार यदि यूपीकोका से माफियाओं पर नकेल कसना चाहती है तो उसके हाथ रोकने की कोशिश न की जाए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि यूपीकोका मंे इस तरह की व्यवस्था है कि इसे बदले की भावना से लागू नहीं किया जा सकता। संगठित अपराध व अपराधियों की कमर तोड़ने के लिए यूपीकोका बनाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश कंट्रोल आफ आर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट (यूपी कोका) की मूल भावना यही है कि जो संगठित गिरोह, माफिया और गुण्डे सामान्य कानूनों को अंगूठा दिखाकर मूछों पर ताव दे रहे हैं, उनको जेल के अंदर  इस तरह से भेजा जा सके कि आसानी से बाहर न आ पायें। इसलिए इस कानून मंे बेहद कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। इसके तहत सात साल से लेकर उम्र कैद तक और मृत्यु दण्ड तक की सजा हो सकती है। आरोपितों पर 15 लाख से 25 लाख तक जुर्माना भी हो सकता है। यूपीकोका आतंकी गतिविधियों मंे लिप्त, संगठित अपराध करने वालों और उनको शरण देने वालों पर भी लागू होगा। पिछले साल विधान परिषद मंे यह कानून पारित नहीं हो सका था। इसलिए संवैधानिक नियमों के अनुसार इसे दूसरी बार विधानसभा मंे पारित किया गया है और अब विधान परिषद मंे भेजा जाएगा। बेहतर होगा कि विधान परिषद मंे इसे पारित कर दिया जाए। विधान परिषद अगर दूसरी बार इसे पारित नहीं करती है तो इस विधेयक को राज्यपाल श्रीराम नाईक के पास भेज दिया जाएगा। राज्यपाल इस विधेयक को निश्चित रूप से पारित करेंगे। हालांकि संभावना यह भी रहेगी कि राज्यपाल इसे राष्ट्रपति के पास भी भेज सकते हैं। बहरहाल अब यूपीकोका कानून का रूप लेगा।
विधानसभा मंे नेता प्रतिपक्ष राम गोविन्द चैधरी ने राजनीतिक तर्क दिया है। वे कहते हैं कि प्रदेश की योगी सरकार जब यह कह रही है कि उसने अपराधियों की नकेल कस दी है, तब इस कानून की क्या जरूरत है। कोई भी सरकार सामान्य रूप से अपनी उपलब्धियां गिनाते हुए ऐसी ही घोषणाएं करती है। श्री चैधरी की सपा सरकार भी यही कहती थी लेकिन यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अपराधियों पर सामान्य कानूनों का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। यही कारण है कि आये दिन लूट, हत्या और डकैती होती हैं। संगठित अपराध करने वाले सक्रिय हैं, निडर हैं और राजनीति का उन्हंे संरक्षण भी मिल रहा है। सपा के साथ बसपा और कांग्रेस ने नेता क्रमशः लालजी वर्मा और अजय कुमार लल्लू ने भी कहा कि यह कानून लोकतंत्र, जन प्रतिनिधियों, संविधान, पत्रकारिता और मानवाधिकारों के विरुद्ध है। अब यह सरकार का दायित्व है कि इन नेताओं को इस प्रकार की शिकायत का अवसर न मिले। हालांकि अपराधियों से सांठगांठ मंे कौन शामिल नहीं है, इसका फैसला करना आसान नहीं रह गया। साफ-सुथरे चेहरे देखकर उनके कारनामों का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। जनता चाहती है कि इस तरह के कथित साफ चेहरे वाले अपराधी भी जेल के अंदर पहुंचे। 
 


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