अराजकता और न्यायिक अवमानना
| Agency - 04 Apr 2018

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और न्यायमूर्ति यू यू ललित की खंडपीठ ने एक ऐेतिहासिक फैसले में अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के दुरुपयोग पर सहमति जताते हुए इसके तहत मिलने वाली शिकायत पर स्वतः एफआईआर और गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। कोर्ट का कहना है कि अधिनियम के तहत किसी सरकारी कर्मी की गिरफ्तारी से पहले उपाधीक्षक या उससे ऊपर के स्तर के अधिकारी द्वारा प्रारंभिक जांच कराना अनिवार्य होना चाहिये। एफआईआर और गिरतारी को लेकर दिशा निर्देश होना चाहिये। संबंधित प्रशासन की पूर्व अनुमति के बाद ही उसकी गिरफ्तारी हो सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट माना है कि एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है। यह बात अक्षरशः सत्य सिद्ध और साबित है कि इस कानून का बेतहाशा दुरुपयोग हो रहा था तथा दलितवाद की राजनीति करने वाले तमाम क्षेत्रीय व स्थानीय दल संगठन इस कानून का अपने पक्ष में दुरुपयोग करते थे। इस कानून के माध्यम से यह सभी दल सवर्ण समाज के प्रति तानाशाही का रवैया अपनाकर उनके ऊपर बेतहाशा फर्जी मुकदमे तक दायर करवा दिये थे। उप्र सहित देश के तमाम अन्य राज्यों में भी स्थानीय स्तर पर  दलितांे को बहकाकर रखने के लिए इस कानून के माध्यम से सवर्ण समुदाय के लोगों पर अत्याचार किये जा रहे थे। ग्रामीण क्षे़त्रों व छोटे शहरों मंे इस प्रकार की वारदातें  बहुतायत में हुई हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि पंचायत नगर निगम या अन्य चुनावों में लोग इस एक्ट की आड में राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियांे के खिलाफ फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। 
विगत 30 वर्षो में संपत्ति विवादों और पैसों के लेनदेन के मामले में इस एक्ट को हथियार  के तौर पर इस्तेमाल किया गया। कोर्ट ने कहा कि समाज में सुविधाविहीन तबके को किसी भी तरह के अत्याचारों से बचाने की जरूरत है। कानून जातिगत विद्वेष नहीं फैला सकता। कोर्ट को यह सुनिश्चित करना होगा। संविधान की प्रस्तावना मार्गदर्शन करने वाले तारे की तरह है इसी के जरिये स्वतंत्रता, समानता और भातृत्व जैसे मूल्यों को सिखाया गया है। 
भारत मंे दो ऐसे कानून बने जिनका सर्वाधिक दुरुपयोग हुआ तथा बहुत दिनों से हो रहा था जिसमें एक एससी एसटी एक्ट और दूसरा दहेज निवारण अधिनियम। इस कानून का इतना अधिक दुरुपयोग हो रहा था कि अकेले 2016 में दलित प्रताड़ना के 5347 मामले दर्ज हो गये। इसकी अनदेखी तो नहीं की जा सकती, वैसे भी अदालतों में काम का बोझ बेतहाशा बढ़ गया है तथा बहुत से मुकदमे फर्जी भी लगे हुये हंै। आज सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को ठीक करने का सराहनीय प्रयास किया है। लेकिन देशहित में सुनाये गये इस फैसले को स्वार्थ की राजनीति करने वाले दलों ,संगठनों को कोर्ट की यह बात हजम नहीं हुई तथा अपनी आदतों से मजबूर होकर बयानबाजी, धरना- प्रदर्शन जनसभायंे तथा अब भारत बंद के आयोजन होने लग गये। दलितवाद की राजनीति करने वाले सभी तथाकथित दलांे को मिर्ची लग गयी और उन्हें केंद्र सरकार व पीएम मोदी की सरकार को घेरने का तथा उन्हेें ध्वस्त करने का एक बड़ा बहाना मिल गया। कोर्ट के फैसले के खिलाफ भारत बंद रखा जा रहा है। जिसका कई जगहों पर व्यापक असर दिखलाई पड़ा। कई जगह तोड़ फोड़ हुई, आगजनी की गयी। रेल सेवा बाधित की गयी। अगर निष्पक्ष नजरिये से देखा जाये तो भारत बंद का ऐलान  व देश में मचायी जा रही अराजकता इस बात का संकेत है कि जब सुप्रीम कोर्ट अयोध्या विवाद पर कोई ऐतिहासिक फैसला सुनायेगा तब भी इसी प्रकार की जन भावनाओं का ज्वार सड़कों पर उमड़ पड़ेगा। अब कोर्ट को यह सब भी देखना पड़ेगा। एक प्रकार से कोर्ट के फैसले के खिलाफ इस प्रकार की आक्रामक कार्यवाही को न्यायिक अवमानना के दायरे में आना चाहिये। भारत बंद पूरी तरह से राजनैतिक स्वार्थो की पूर्ति के लिए दलित भावनाओं के ज्वार को उभारकर अपना राजनैतिक हित साधने के लिए बुलाया गया। भारत बंद उन विपक्षी दलों की ओर से  किया गया आंदोलन है जो अभी तक पीएम मोदी की लोकप्रियता की जमीन को उखाड़ फेकने में असमर्थ रहे हंै तथा उनके सभी प्रयास विफल रहे हैं। यह सभी दल नहीं चाहते कि भारत में सामाजिक समरसता का वातावरण बन सके। भारत का समाज मजबूत बन सके तथा भारत एक मजबूत राष्ट्र बन सके। इन दलों व दलित सांसदोें की जमीनी राजनीति के चलते सरकार को भी दबाव में आकर कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने को मजबूर होना पड़ा है। 
आज देश में दलित व पिछडे़ समाज को एक से बढ़कर एक सहायता दी जा रही है। आखिर वह भी देश के नागरिक है लेकिन इन तथाकथित संकीर्ण राजनैतिक विचारधारा वाले दलों ने केवल इनको अपना वोटबैंक समझ लिया है। सपा और बसपा जैसे दल चाहते हंै कि यह लोग केवल हमारे है। इन पर किसी और का अधिकार हो ही नहीं सकता। यह सोच इन दलों की तानाशाही विकृति है। इस कानून के सहारे सवर्ण समाज पर बेतहाशा अत्याचार हो रहे थे  तथा यह दल अपनी विकृत राजनैतिक रोटी सेंक रहे थे जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा प्रहार किया है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस फैसले की पूरे देशभर में सराहना होनी चाहिये थी, आज उसका विरोध हो रहा है तथा वह भी भारत बंद तथा उसकी आड़ में अराजकता व गुंडागर्दी  करवाकर । आज जहां -जहां धरना प्रदर्शन हो रहा हैं वहां पर केवल पीएम मोदी विरोधी नारेबाजी ही की जा रही है, जिससे इसका आयोजन करने वाले दलों व संगठनों की मंशा पर वास्तविक सवालिया निशान भी खड़े हो रहे हैं। सामाजिक संतुलन की दृष्टि से दलित कानून के दमनकारी पक्ष को परिमार्जित करने की इस अदालती पहल का सर्वसमाज द्वारा स्वागत होना चाहिये था लेकिन उसका सुनियोजित साजिश के तहत विरोध हो रहा है। जिन लोगों ने आज देश में अराजकता व एक वर्ग विशेष  के खिलाफ भय का वातावरण उत्पन्न किया है क्या वह सब भी न्यायिक परिधि मंे आ सकता है? 
भारत बंद के खिलाफ पूरे देश भर में जो प्रदर्शन किये गये उसमें उप्र के मेरठ में पुलिस चैकी को आग के हवाले कर दिया वहीं दो बसांे को आग लगा दी, कई जगह जाम लगा दिया गया है। देश भर से बंद समर्थकों व विरोधियों के बीच मारपीट व हिंसक झड़पों की वारदातें हुई हैं। कई जगहांे पर बंद को देखते हुए रेल, बस सेवा तथा हवाई यातायात और इंटरनेट सेवा को बंद कर दिया गया। आजादी के 70 साल बाद भी जातिगत और आरक्षण की राजनीति पर अपनी राजनैतिक रोटियां सभी दल सेंक रहे हंै। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अब किसी को भी सबका साथ सबका विकास का नारा पसंद नहीं आ रहा। सभी लोगों ने अपनी पुरानी राह को पकड़ लिया है। किसी भी दल ने देश हित व समाज हित में इस फैसले को नहीं पड़ा  और लग गये अपनी राजनैतिक स्वार्थ की पूर्ति करने में।
 


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