डा. बीआर आम्बेडकर को नमन
| Agency - 13 Apr 2018

हमारे देश के संविधान निर्माता बाबा साहेब डा0 भीमराव आम्बेडकर को सिर्फ श्रद्धांजलि ही नहीं चाहिए, उनके विचारों पर मनन करने की जरूरत है। आज उनके नाम पर जिस तरह से राजनीति की जा रही है, उसे देखकर दुख भी होता है और घृणा भी पैदा होती है। अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम पर देश की सबसे बड़ी अदालत के फैसले को लेकर जिस तरह जगह-जगह हिंसा की गयी और अब उस पर राजनीति हो रही है, ऐसे लोगों की श्रद्धांजलि भी बाबा साहेब स्वीकार नहीं कर पाएंगे। बाबा साहेब को एक समाज विशेष से जोड़ दिया गया है जबकि वह कहा करते थे कि मनुष्य एवं उसके धर्म को समाज के द्वारा नैतिकता के आधार पर चयन करना चाहिए। अगर धर्म को ही मनुष्य के लिए सब कुछ मान लिया जाएगा तो किन्हीं और मानकों का कोई मूल्य नहीं रह जाएगा। इसी तरह अपने देश के प्रति वे कितने गहन चिंतन से सोचते थे, इसका पता उनके इस कथन से लगाया जा सकता है- भारतीयों पर दो भिन्न विचारधाराएं शासन कर रही हैं। एक तरफ राजनैतिक अर्थात् देश जो उन्हंे संविधान के तहत स्वतंत्रता, समानता और आदर्श की तरफ प्रेरित करती है तो दूसरी तरफ धर्म और जाति जो इसके विरुद्ध इन सबका तिरस्कार करते हैं। इसलिए ज्ञान का विकास  ही मनुष्य का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए और राजनीतिक शरीर जब बीमार होता है तो उसे कानून और व्यवस्था की दवा ही ठीक कर सकती है। इस तरह की विचारधारा वाले डा. वीआर आम्बेडकर के जन्मदिन 14 अप्रैल पर उन्हंे हम श्रद्धा से नमन करते हैं।
डॉ॰ भीमराव आंबेडकर जिन्हें बाबासाहेब के नाम से भी जाना जाता है, के जन्म दिन 14 अप्रैल को त्योहार के रूप में भारत समेत पूरी दुनिया में मनाया जाता है। इस दिन को समानता दिवस और ज्ञान दिवस के रूप में भी मनाया जाता है, क्योंकि जीवन भर समानता के लिए संघर्ष करने वाले प्रतिभाशाली डॉ0 भीमराव आंबेडकर को समानता का प्रतीक और ज्ञान का प्रतीक भी कहां जाता है। भीमराव विश्व भर में उनके मानवाधिकार आंदोलन, संविधान निर्माण और उनकी प्रकांड विद्वता के लिए जाने जाते हैं और यह दिवस उनके प्रति वैश्विक स्तर पर सम्मान व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है। उनके जन्मदिन पर हर साल उनके लाखों अनुयायी उनके जन्मस्थल महू (मध्य प्रदेश), बौद्ध धम्म दीक्षास्थल दीक्षाभूमि, नागपुर और उनका समाधी स्थल चैत्य भूमि, मुंबई में उन्हें अभिवादन करने लिए इकट्ठा होते है। सरकारी दफ्तरों और भारत के हर बौद्ध विहार में भी भीमराव की जयंती मनाकर उन्हें नमन किया जाता है। विश्व के 55 से अधिक देशों में डॉ0 भीमराव आंबेडकर की जयंती मनाई जाती है। गुगल ने डॉ0 आंबेडकर की 124 वी जयंती 2015 पर अपने गुगल डुडल पर उनकी तस्वीर लगाकर उन्हें अभिवादन किया। साल 2016 में भारत सरकार ने बड़े पैमाने पर भीमराव की 125वी जयंती मनाई थी। संयुक्त राष्ट्र ने भी पहली बार डॉ0 आंबेडकर की 125 वी जयंती मनाई जिसमें 156 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। संयुक्त राष्ट्र नेे डॉ॰ आंबेडकर जी को विश्व का प्रणेता कहकर उनका गौरव गान किया। भारत के लोगों के लिये बाबासाहेब डॉ॰ भीमराव अंबेडकर का जन्म दिवस और उनके योगदान को याद करने के लिये 14 अप्रैल को एक उत्सव से कहीं ज्यादा उत्साह के साथ मनाया जाता है। 
भारत के लोगों के लिये उनके विशाल योगदान को याद करने के लिये बहुत ही खुशी से भारत के लोगों द्वारा अंबेडकर जयंती मनायी जाती है। डॉ भीमराव अंबेडकर भारतीय संविधान के पिता थे जिन्होंने भारत के संविधान का ड्रॉफ्ट (प्रारुप) तैयार किया था। वो एक महान मानवाधिकार कार्यकर्ता थे जिनका जन्म 14 अप्रैल 1891 को हुआ था। उन्होंने भारत के निम्न स्तरीय समूह के लोगों की आर्थिक स्थिति को बढ़ाने के साथ ही शिक्षा की जरूरत के लक्ष्य को फैलाने के लिये भारत में वर्ष 1923 में “बहिष्कृत हितकरनी सभा” की स्थापना की थी। इंसानों की समता के नियम के अनुसरण के द्वारा भारतीय समाज के पुनर्निर्माण के साथ ही भारत में जातिवाद को जड़ से हटाने के लक्ष्य के लिये “शिक्षित करना-आंदोलन करना-संगठित करना” के नारे का इस्तेमाल कर लोगों के लिये वो एक सामाजिक आंदोलन चला रहे थे। अस्पृश्य लोगों के लिये बराबरी के अधिकार की स्थापना के लिये महाराष्ट्र के महाड में वर्ष 1927 में उनके द्वारा एक मार्च का नेतृत्व किया गया था जिन्हें “सार्वजनिक चॉदर झील” के पानी का स्वाद या यहाँ तक की छूने की भी अनुमति नहीं थी। जाति विरोधी आंदोलन, पुजारी विरोधी आंदोलन और मंदिर में प्रवेश आंदोलन जैसे सामाजिक आंदोलनों की शुरुआत करने के लिये भारतीय इतिहास में उन्हें चिन्हित किया जाता है। वास्तविक मानव अधिकार और राजनीतिक न्याय के लिये महाराष्ट्र के नासिक में वर्ष 1930 में उन्होंने मंदिर में प्रवेश के लिये आंदोलन का नेतृत्व किया था। उन्होंने कहा कि दलित वर्ग के लोगों की सभी समस्याओं को सुलझाने के लिये राजनीतिक शक्ति ही एकमात्र तरीका नहीं है, उन्हें समाज में हर क्षेत्र में बराबर का अधिकार मिलना चाहिये। 1942 में वाइसराय की कार्यकारी परिषद की उनकी सदस्यता के दौरान निम्न वर्ग के लोगों के अधिकारों को बचाने के लिये कानूनी बदलाव बनाने में वो गहराई से शामिल थे। भारतीय संविधान में राज्य नीति के मूल अधिकारों (सामाजिक आजादी के लिये, निम्न समूह के लोगों के लिये समानता और अस्पृश्यता का जड़ से उन्मूलन) और नीति निदेशक सिद्धांतों (संपत्ति के सही वितरण को सुनिश्चित करने के द्वारा जीवन निर्वाह के हालात में सुधार लाना) को सुरक्षा देने के लिए उन्होंने अपना बड़ा योगदान दिया। बुद्ध धर्म के द्वारा अपने जीवन के अंत तक उनकी सामाजिक क्रांति जारी रही। भारतीय समाज के लिये दिये गये उनके महान योगदान के लिये 1990 के अप्रैल महीने में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। पूरे भारत भर में वाराणसी, दिल्ली सहित दूसरे बड़े शहरों में बेहद जुनून के साथ आंबेडकर जयंती मनायी जाती है। कचहरी क्षेत्र में डॉ आंबेडकर जयंती समारोह समिति के द्वारा डॉ आंबेडकर के जन्मदिवस उत्सव के लिये कार्यक्रम वाराणसी में आयोजित होता है। वो विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करते हैं जैसे चित्रकारी, सामान्य ज्ञान प्रश्न-उत्तर प्रतियोगिता, चर्चा, नृत्य, निबंध लेखन, परिचर्चा, खेल प्रतियोगिता और नाटक जिसके लिये पास के स्कूलों के विद्यार्थियों सहित कई लोग भाग लेते हैं। 


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