हाॅलीवुड में प्रियंका चोपड़ा हुई थीं निराश
| Agency - 16 Apr 2018

प्रियंका चोपड़ा ने अभी हाल में बताया था कि हाॅलीवुड में उन्हें रंगभेद की वजह से एक जगह काम नहीं मिला लेकिन रंगभेद के मामले में बाॅलीवुड भी पीछे नहीं है। बॉलिवुड में ज्यादातर हीरोइन का गोरा, लंबा होना अनिवार्य है। ऐसी बहुत ही कम फिल्में रही होंगी, जहां सांवली अभिनेत्रियों को लिया गया हो। यही वजह है नंदिता दास, शहाणा गोस्वामी, तनिष्ठा चटर्जी, फ्रीडा पिंटो जैसी अभिनेत्रियों को मेन स्ट्रीम फिल्मों में बेहद ही कम मौका मिलता है। 
शहाणा गोस्वामी ने इंटरव्यू के दौरान कहा था, बॉलिवुड में मेरे जैसी सांवले रंग की लड़कियों या लड़कों की अपेक्षा गोरे रंग की लड़कियों को प्राथमिकता ज्यादा दी जाती है। मैं एक बार अपने सांवले रंग की वजह से एक फिल्म से बाहर निकाल दी गई थी। बॉलिवुड की टॉप ऐक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा ने हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान यह बात कबूली है कि अपने डार्क रंग की वजह से उनके हाथों से एक हॉलिवुड फिल्म निकल गई। प्रियंका ने कहा कि पिछले साल जब वह एक फिल्म की शूटिंग के लिए बाहर गई हुई थीं, तब एक स्टूडियो से उनके मैनेजर की बात हुई। मैनेजर को कहा गया कि प्रियंका फिल्म के लिए फिट नहीं हैं और इसकी वजह उनकी फिजिकैलिटी बताई गई। बाद में जब इस बारे में पड़ताल की गई, तो पता चला कि फिजिकैलिटी का तात्पर्य उनकी स्किन कलर से था। इससे एक बात साफ हो गई कि हॉलिवुड में भी कलाकार रंगभेद का शिकार होते हैं, मगर हम एक निगाह बॉलिवुड पर डालें, तो रंगभेद के मसले पर हॉलिवुड की तुलना में बॉलिवुड कहीं आगे है। ऐक्ट्रेसेज की कास्टिंग ही नहीं, बल्कि बॉलिवुड के गानों और विज्ञापनों में भी रंगभेद साफ नजर आता है। 
बॉलिवुड सोच प्रेरक सिनेमा के मामले में काफी आगे बढ़ा हैं लेकिन इंडस्ट्री के कई नामी लोगों की मानसिकता जस के तस है। प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स को अपनी ऐक्ट्रेस गोरी, लंबी और छरहरी काया वाली ही चाहिए, जिसका खामियाजा ऐसे कई सशक्त ऐक्टर्स को भुगतना पड़ता है, जिनका रंग सांवला है। तनिष्ठा चटर्जी जैसी ऐक्ट्रेस जब एक कॉमिडी शो में जाती हैं, तो उनके रंग को लेकर मजाक बनाया जाता है। हालांकि, खुद पर की गई नस्लभेद टिप्पणी को लेकर तनिष्ठा ने चैनल और शो को खरी-खरी सुनाई। वहीं, मनोज बाजपेयी को उनकी फिल्म जुबैदा के लिए परफेक्ट कास्ट नहीं कहा गया था। दरअसल क्रिटिक्स का तर्क था कि मनोज कहीं से भी राजा नहीं दिखते हैं। बिपाशा बसु को कई फीमेल ऐक्ट्रेसेज काली बिल्ली कहकर बुलाया करती थीं। यही नहीं, ऋषि कपूर ने भी नवाजुद्दीन सिद्दिकी को औसत कलाकार बताया था और कहा था कि वह रोमांस करने के लायक नहीं हैं। अपनी सशक्त ऐक्टिंग के लिए पहचानी जाने वाली नंदिता दास ने एक बार कहा था, हम अक्सर रंगभेद का शिकार होते रहते हैं। लोग कहते रहते हैं कि वह गोरी है। जैसे कि डार्क स्किन होना अच्छी बात नहीं है। फिल्मों और गानों में भी इसी बात को बढ़ावा दिया जाता है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि बॉलिवुड के गानों ने भी रंगभेद को बढ़ावा देने में अपना भरपूर योगदान दिया है। अक्सर गानों के बोल गोरे रंग की ओर ही इशारा करते हैं। गानों में कलाइयां हमेशा गोरी ही रही हैं। गोरा रंग काला न पड़ जाए, गोरे रंग पर इतना गुमान कर, गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा जैसे गीतों से लेकर चिट्टियां कलाइयां वे, जैसे कई गीत हैं, जिसे सुनकर लोगों के जेहन में खूबसूरती की परिभाषा केवल गोरा रंग होकर रह गई है।  ऐक्टिंग की रेस में बने रहने के लिए ऐक्ट्रेस के सिर पर सबसे बड़ा प्रेशर उनकी छरहरी काया और रंग को लेकर होता है। यही वजह है कि ऐक्ट्रेसेज तमाम तरह की सर्जरी और फेयरनेस ट्रीटमेंट का दर्द झेलने को भी तैयार हो जाती हैं। जब ऐक्ट्रेस रेखा ने बॉलिवुड में कदम रखा था, तो उन्हें काली-कलूटी कहकर हीनताभरी नजरों से देखा जाता था। दरअसल, करियर के शुरुआती दौर में रेखा मोटी और काली थीं। इस वाकये का जिक्र उनके ऊपर लिखी गई किताब द अन्टोल्ड स्टोरीज में किया गया है। रेखा के अलावा शिल्पा शेट्टी, काजोल, दीपिका आदि के रंग समय बीतते ही लाइट होते चले गए। कहा जाता है कि इन तमाम ऐक्ट्रेसेज ने ग्लैमर इंडस्ट्री की रेस में बने रहने के लिए सर्जरी और फेयरनेस ट्रीटमेंट का दर्द सहा है। (हिफी)
 


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