गंगा ने हमको बहुत दिया लेकिन हमने.........
| Agency - 25 Apr 2018

गंगा भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी है और इसका धार्मिक महत्व भी बहुत अधिक है। कहते है कि इसका जल घर में शीशी या प्लास्टिक के डिब्बे आदि में भरकर रख दें तो बरसों तक खराब नहीं होता है और कई तरह के पूजा-पाठ में इसका उपयोग किया जाता है। हिन्दू धर्म में 20 प्रमुख नदियों का जिक्र है। प्रमुख नदियों में से 4 नदियां- सिन्धु, सरस्वती, गंगा और ब्रह्मपुत्र हिमालय से निकलती हैं। शेष इन्हीं नदियों की सहायक नदियां हैं या फिर वे प्रायद्वीपीय नदियां हैं अर्थात जिनका हिमालय की नदियों से कोई संबंध नहीं है। इनमें से सरस्वती अब लुप्त हो गई है। सरस्वती के लुप्त होने के पीछे दो कारण है- प्राकृतिक और मानव की गतिविधि। उसी तरह गंगा यदि मर रही है तो उसके प्राकृतिक कारण कम और मानव की गतिविधियां ज्यादा हैं। कैसे? हम यह आपको बताएंगे। अखंड भारत की ये प्रमुख नदियां हैं- 1. सिन्धु, 2. सरस्वती, 3. गंगा, 4. यमुना, 5. गोदावरी, 6. नर्मदा (रेवा), 7. कृष्णा, 8. महानदी (महानंदा, चित्रोत्पला), 9. कावेरी, 10. ताप्ती, 11. सरयू और 12. मेघना, 13. ब्राह्मणी, 14. पेन्नार, 15. माही, 16. साबरमती, 17. शिप्रा, 18. स्वात, 19. कुंभा (काबुल) और 20. किशनगंगा (नीलम)। सिन्धु की जितनी भी सहायक नदियां हैं, वे सभी पवित्र नदियां मानी जाती हैं। हिन्दुओं की प्रारंभिक सभ्यता सिन्धु, सरस्वती और ब्रह्मपुत्र नदी के पास ही बसी और विकसित हुई थी। उक्त 3 नदियों का धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। सिन्धु की सभी सहायक नदियां जैसे कि वितस्ता, चन्द्रभागा, ईरावती, विपासा, शुतुद्री, झेलम, चिनाब, रावी, व्यास, सतलुज, गिलगिट, काबुल, स्वात, कुर्रम, टोची, गोमल, संगर आदि का वेदों में उल्लेख मिलता है। इन नदियों ने तो हमें बहुत कुछ दिया लेकिन यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि लगभग सभी नदियों को प्रदूषित करने में हिन्दू धर्म के लोगों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसके बाद गंगा के हत्यारे वे शहर और गांव हैं, जो गंगा के किनारे बसे हैं जैसे हरिद्वार, मुरादाबाद, रामपुर, कन्नौज, कानपुर, भागलपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, ऋषिकेश, पटना आदि।
ढाई हजार किलोमीटर क्षेत्र में फैली गंगा के किनारे छोटे-बड़े 800 तीर्थ हुआ करते थे। इन तीर्थों में रहने, जाने और स्नान आदि करने का अनुशासन था, लेकिन वह अब नहीं रहा। लेकिन पिछले 60 वर्ष में बाजारवाद और आधुनिकता अभिमानी तंत्र ने तीर्थों की उस व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। देशभर से गंगा में स्नान करने लोग आते हैं। कुंभ के दौरान तो लाखों लोग गंगा में डुबकी लगाते हैं। गंगा में स्नान कर सभी अपने पाप धोना चाहते हैं। सिर्फ पापी लोग ही गंगा में स्नान करते हैं। पापियों के पाप धोते-धोते गंगा मैली नहीं, जहरीली हो गई है। ये जितने भी पापी हैं, अपने पाप धोने के साथ गंगा के पानी को गंदा भी कर जाते हैं। नदी के किनारे ही ये अपना मल-मूत्र त्यागते हैं, वहीं भोजन करते हैं और प्लास्टिक, कचरा आदि वहीं फेंककर चल देते हैं। गंगा की पूजा के नाम पर गंगा में लाखों टन हार-फूल, नारियल आदि फेंक दिया जाता है। पत्तों पर रखकर दीये जलाए जाते हैं और उन्हें भी पानी में बहा दिया जाता है। फिर होती है गंगा आरती। पूरे देश में गंगा का जल बेचा जाता है। लाखों श्रद्धालु गंगा का जल एक छोटे-से लोटे में भरकर ले जाते हैं और अपने घरों में पूजा स्थान पर रखते हैं।  कई त्योहारों पर हानिकारक रंगों से युक्त देवी-देवताओं की प्रतिमाएं गंगा में प्रवाहित कर उसे प्रदूषित किया जाता है। धार्मिक आस्था के चलते कई लोग अपने मृतकों को गंगा में बहा देते हैं। गंगा में 2 करोड़ 90 लाख लीटर से ज्यादा प्रदूषित कचरा हर रोज गिर रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार कुल 138 नाले गंगा में 6087 एमएलडी गंदगी छोड़ते हैं, जिनमें 14 उत्तराखंड, 45 उत्तरप्रदेश, 25 बिहार और 54 नाले पश्चिम बंगाल में हैं। इसके अलावा 764 अति-प्रदूषित औद्योगिक इकाइयां गंगा में गंदगी डाल रही हैं जिसमें 687 उत्तर प्रदेश में हैं। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तरप्रदेश में बहुत-सी बीमारियों का कारण जहर बन चुका गंगाजल है। आज गंगा जल पीने व नहाने के योग्य नहीं रहा। कई वैज्ञानिकों के अनुसार गंगा का पानी फसलों की सिंचाई करने के योग्य भी नहीं है। सीपीसीबी ने एनजीटी को 956 औद्योगिक इकाइयों की सूची सौंपी थी जिनसे गंगा में प्रदूषण हो रहा है। इन सभी औद्योगिक इकाइयों पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। गंगा के किनारे लगे परमाणु बिजलीघर, रासायनिक खाद, शकर के कारखाने और चमड़े के कारखाने जहर भरा अपना औद्योगिक कचरा गंगा में फेंक रहे हैं। मोदी सरकार के आने के बाद भी यह कचरा फेंका जा रहा है। तत्काल प्रभाव से इन इकाइयों को बंद नहीं किया गया तो जानकार कहते हैं कि मात्र 20 साल में गंगा पूरी तरह से मर जाएगी। इस नदी में मछलियों तथा सर्पों की अनेक प्रजातियां तो पाई ही जाती हैं, मीठे पानी वाले दुर्लभ डालफिन भी पाए जाते हैं। जल प्रदूषण और जल की कमी के कारण हजारों दुर्लभ जलचर जंतुओं का जीवन अब खतरे में है। इसको वैज्ञानिक आधार पर अचूक और सही बताया गया है कि उसके अनुसार नदी के जल में मौजूद बैक्टीरियोफेज नामक जीवाणु गंगाजल में मौजूद हानिकारक सूक्ष्म जीवों को जीवित नहीं रहने देते अर्थात ये ऐसे जीवाणु हैं, जो गंदगी और बीमारी फैलाने वाले जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं। इसके कारण ही गंगा का जल नहीं सड़ता है। भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी गंगा का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। इसका जल घर में शीशी या प्लास्टिक के डिब्बे आदि में भरकर रख दें तो बरसों तक खराब नहीं होता है और कई तरह के पूजा-पाठ में इसका उपयोग किया जाता है। ऐसी आम धारणा है कि मरते समय व्यक्ति को यह जल पिला दिया जाए तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। दरअसल गंगा जल में प्राणवायु की प्रचुरता बनाए रखने की अदभुत क्षमता है। इस तरह के अमृत जैसे जल को हम जहरीला क्यों बना रहे हैं? यह बात सरकार ही नहीं हम सभी को सोचनी पड़ेगी। 
 


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