मंगल को जन्मे, मंगल ही करते
| Agency - 01 May 2018

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के परम भक्त हनुमान जी को अमर होने का वरदान माता सीता ने दिया था। भगवान राम ने उन्हें अनपायनी भक्ति दी थी। हनुमान जी का जन्म मंगलवार को हुआ था। वे अपने भक्तों का हमेशा मंगल अर्थात् कल्याण करते हैं। हिन्दू धर्म मंे ज्येष्ठ महीने के मंगलवार हनुमान जी की उपासना के विशिष्ट दिन माने गये हैं। इस बार ज्येष्ठ माह पुरुषोत्तम माह के रूप मंे आया है। इसलिए नौ मंगलवार हनुमान जी की उपासना के लिए मिलंेगे। पहला बड़ा मंगल 1 मई को होगा। हनुमान जी की पूजा-अर्चना पूरे देश ही नहीं दुनिया भर मंे की जाती है। विदेशों मंे हनुमान जी के कई मंदिर हैं। श्रीलंका मंे तो रामायण कालीन अवशेषों की खोज हो रही है, जहां सीता जी का पता लगाने के लिए श्रीराम से पहले हनुमान जी पहुंचे थे। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ मंे ज्येष्ठ के मंगलों का बहुत महत्व है औैर हनुमान मंदिरों मंे श्रद्धालु उमड़ते हैं, जगह-जगह भंडारा खिलाया जाता है और श्रद्धालु लेटकर परिक्रमा करते हुए मंदिर पहुंचते हैं।
वानरराज केशरी और अंजना के पुत्र हनुमान जी को शंकर सुअन और पवन पुत्र भी कहा जाता है। माता अंजना ने शंकर जी की आराधना तेजस्वी पुत्र के लिए की थी और पवन देव ने हनुमान जी की उस समय पिता की तरह रक्षा की थी जब हनुमान जी पका हुआ फल समझ कर सूर्य को खाने पहुंचे और देवराज इन्द्र ने वज्र का प्रहार करके उन्हें मरणासन्न कर दिया था। हनुमान जी असीम शक्तियों के मालिक हैं। उन्होंन सुग्रीव की भगवान राम से मित्रता कराकर उन्हें किष्किंधा का राजा बनाया और रावण के भाई विभीषण को श्रीराम की शरण दिलाकर लंका का राजा बनवा दिया। हनुमान जी ने लक्ष्मण जी को शक्ति लगने पर संजीवनी बूटी लाकर उनके प्राण बचाये और पाताल लोक मंे जाकर अहिरावण का भी संहार किया। उन्होंने रावण को भी बहुत समझाया कि वह भगवान श्रीराम का विरोध न करे लेकिन उस महा अहंकारी ने हनुमान जी की बात नहीं मानी उसका पूरा वंश नष्ट हो गया। इस प्रकार हनुमान जी ने सभी का मंगल किया और आज भी अपने आराधकों की हर प्रकार से रक्षा करते हैं। इसीलिए कहते हैं- 
‘संकट कटै मिटै सब पीरा
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।’
राजधानी लखनऊ में मनाया जाने वाला बड़ा मंगल सिर्फ हिन्दू धर्म की आस्था का प्रतीक ही नहीं है बल्कि विभिन्न धर्मों के लोगों की भी इसमें आस्था है। इस आयोजन में हिन्दू, मुस्लिम, सिख व ईसाई आदि सभी धर्मों के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। मान्यता है कि इस परम्परा की शुरुआत लगभग 400 वर्ष पूर्व एक मुगल शासक ने की थी। नवाब मोहमद अली शाह का बेटा एक बार गंभीर रूप से बीमार हुआ। उनकी बेगम रूबिया ने उसका कई जगह इलाज कराया लेकिन वह ठीक नहीं हुआ। बेटे की सलामती की मन्नत मांगने वह अलीगंज के पुराने हनुमान मंदिर आयीं। पुजारी ने बेटे को मंदिर में ही छोड़ देने को कहा। बेगम रूबिया रात में बेटे को मंदिर में ही छोड़ गयीं। दूसरे दिन रूबिया को बेटा पूरी तरह स्वस्थ मिला। बेगम रूबिया ने इस पुराने हनुमान मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। जीर्णोद्धार के समय लगाया गया प्रतीक चांदतारा का चिह्न आज भी मंदिर के गुंबद पर चमक रहा है। मंदिर के जीर्णोद्धार के साथ ही मुगल शासक ने उस समय ज्येष्ठ माह में पडने वाले मंगल को पूरे नगर में गुड़ धनिया (भुने हुए गेहूं में गुड मिलाकर बनाया जाने वाला प्रसाद) बंटवाया और प्याऊ लगवाये थे। तभी से इस बडे़ मंगल की परम्परा की नींव पडी। बडा मंगल मनाने के पीछे एक और कहानी है। नवाब सुजा-उद-दौला की दूसरी पत्नी जनाब-ए-आलिया को स्वप्न आया कि उसे हनुमान मंदिर का निर्माण कराना है। सपने में मिले आदेश को पूरा करने के लिये आलिया ने हनुमान जी की मूर्ति मंगवाई। हनुमान जी की मूर्ति हाथी पर लाई जा रही थी। मूर्ति को लेकर आता हुआ हाथी अलीगंज के एक स्थान पर बैठ गया और फिर उस स्थान से नहीं उठा। आलिया ने उसी स्थान पर मंदिर बनवाना शुरू कर दिया जो आज नया हनुमान मंदिर कहा जाता है। मंदिर का निर्माण ज्येष्ठ महीने में पूरा हुआ। मंदिर बनने पर मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करायी गयी और बड़ा भंडारा हुआ। तभी से जेठ महीने का हर मंगलवार बड़ा मंगल के रूप में मनाने की परम्परा चल पड़ी। चार सौ साल पुरानी इस परंपरा ने इतना वृहद रूप ले लिया है कि अब पूरे लखनऊ के हर चैराहे व हर गली पर भंडारा चलता है।
इसी कहानी को दूसरे प्रकार से भी लोग बताते हैं। एक रात अवध के शिया नवाब शुजा-उद-दौला की पत्नी आलिया बेगम के स्वप्न में हनुमान जी स्वयं प्रकट हुए और उन्हें निर्देश दिया कि फलां स्थान पर धरती में मेरी मूर्ति दफन है उसे निकालो, बेगम आलिया ने हनुमान जी द्वारा चिन्हित स्थान पर खुदाई प्रारम्भ करवाई। बेगम साहिबा ने हनुमान जी से प्रार्थना की लेकिन जब बहुत देर हो गयी और हनुमान जी की मूर्ति नहीं निकली तो वहां उपस्थित लोग दबी जबान में बेगम साहिबा का मजाक उड़ाने लगे। बेगम साहिबा तनिक भी विचलित नहीं हुईं उन्होंने हाथ जोड़कर हनुमान जी से प्रार्थना की कि आप ही के आदेश पर मैंने खुदाई शुरू करवाई है अब मेरे साथ-साथ आपकी इज्जत भी दाव पर लगी है, बेगम साहिबा की प्रार्थना पूरी भी नहीं हुई थी कि जय हनुमान के नारे लगने लगे, हनुमान जी की मूर्ति प्रकट हो चुकी थी, बेगम आलिया की आँखों में श्रद्धा के आंसू थे। इस प्रकार लखनऊ मंे हनुमान जी का महत्व सैकड़ों वर्षों से रहा है। 
 


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