तुलसी जैसी औषधि को बना दिया देवी
| Agency - 12 May 2018

किसी भी पूजा में तुलसी के पत्ते का प्रयोग शुभ और शुद्ध माना गया है। खास तौर पर विष्णु जी की पूजा में तुलसी के पत्ते चढ़ाने से भगवान बहुत प्रसन्न होते हैं। इसके आलावा विष्णु जी के ही एक स्वरुप भगवान शालिग्राम तुलसी जी के पति हैं। काले रंग के चिकने पत्थर को भगवान शालिग्राम के रूप में पूजा जाता है। यह पत्थर विशेष रूप से नेपाल स्थित गंडकी नदी में पाए जाते हैं।
हमारे वेद-पुराण और उपनिषद जीवन के गंभीर रहस्यों से भरी हुई हैं। इनका चिन्तन-मनन करने से ज्ञान के रत्न ही नहीं मिलते बल्कि हमारे समाज को सुव्यवस्थित और सक्रिय रखने के उपाय भी मिलते हैं। इन ग्रंथों में जल, अग्नि, व वायु को देवता माना गया क्योंकि इनके बिना हमारा जीवन संभव नहीं है। पेड़-पौधों और गंगा नदी को माता की संज्ञा दी गयी। भवन देवता हैं। पीपल और बरगद जैसे आक्सीजन देने वाले वृक्षों की पूजा की जाती है। इसी तरह तुलसी का पौधा जो औषधियों से भरा है और हमें कई बीमारियों से बचाता है, उसे घर-घर लगाने उसकी सेवा करने के लिए ही तुलसी को देवी का रूप दिया गया है। तुलसी को भगवान शालिग्राम की पत्नी के रूप में पूजा जाता है और उसकी पत्तियों को प्रसाद के रूप में खाकर कई बीमारियों से शरीर की रक्षा की जाती है। तुलसी को लेकर पौराणिक कथा भी है जिसे हम यहां बता रहे हैं। हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे को देवी का रूप मानकर इसकी पूजा की जाती है। कहते हैं घर के आँगन में तुलसी का पौधा लगाना बड़ा ही शुभ होता है और सुबह शाम इसकी पूजा करने से घर में सुख शान्ति और समृद्धि बनी रहती है। किसी भी पूजा में तुलसी के पत्ते का प्रयोग शुभ और शुद्ध माना गया है। खास तौर पर विष्णु जी की पूजा में तुलसी के पत्ते चढ़ाने से भगवान बहुत प्रसन्न होते हैं। इसके आलावा विष्णु जी के ही एक स्वरुप भगवान शालिग्राम तुलसी जी के पति हैं।  काले रंग के चिकने पत्थर को भगवान शालिग्राम के रूप में पूजा जाता है। यह पत्थर विशेष रूप से नेपाल स्थित गंडकी नदी में पाए जाते हैं। 
कहते हैं भगवान शालिग्राम को तुलसी बहुत ही प्रिय है इसलिए शालिग्राम के पत्थर पर तुलसी का पत्ता अर्पित करने से यह अपने भक्तों की मनोकामना जरूर पूरी करते हैं। इसके आलावा हम सब जानते हैं कि विष्णु जी की ही पूजा भगवान सत्यनारायण की पूजा है। इस पूजा में भी शालिग्राम के पत्थर को रखना बहुत जरूरी होता है। कहा जाता है घर में एक से ज्यादा शालिग्राम नहीं होने चाहिए। साथ ही जिस भी घर में शालिग्राम होता है उन्हें साफ सफाई का खास ध्यान रखना चाहिए। जिस प्रकार बिना स्नान किये तुलसी के पौधे को छूना वर्जित माना गया है ठीक उसी प्रकार भगवान शालिग्राम को भूल कर भी बिना नहाए कभी नहीं छूना चाहिए। इनकी पूजा में मनुष्य को अपने तन के साथ मन को भी साफ रखना चाहिए तभी उसकी प्रार्थना स्वीकार होती है। शिवपुराण के अनुसार दंभ नामक दैत्य को भगवान विष्णु के आशीर्वाद से पुत्र की प्राप्ति हुई थी जिसका नाम शंखचूड़ था। शंखचूड़ जब बड़ा हुआ तो उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव ने उसे वरदान मांगने को कहा। तब शंखचूड़ ने उनसे कहा कि हे ब्रह्मदेव आप मुझे ऐसा वरदान दीजिये कि मैं देवताओं के लिए अजेय हो जाऊं, मुझे कोई न हरा सके। उसकी बात सुनकर ब्रह्मा जी ने उसे बदरीवन जाकर वहां तपस्या कर रही तुलसी जी से विवाह करने के लिए कहा। कहते हैं जब शंखचूड़ वहां पहुंचा तो वह तुलसी जी की सुंदरता से मोहित हो गया। ब्रह्मा जी ने स्वयं उन दोनों का गंधर्व विवाह सम्पन्न कराया था। तुलसी जी से विवाह के पश्चात शंखचूड़ और भी शक्तिशाली हो गया।
शंखचूड़ श्री कृष्ण का परम भक्त था। वह हमेशा उनकी भक्ति में ही लीन रहता था लेकिन उसे अपनी शक्तियों पर अहंकार हो गया था। उसने अपने बल से समस्त देवताओं पर भी विजय हासिल कर ली थी। एक दिन सभी देवतागण परेशान होकर विष्णु जी के पास गए और अपनी समस्या का समाधान करने को कहा। ब्रह्मदेव ने उन्हें बताया कि शंखचूड़ का वध शिव जी के त्रिशूल से ही संभव है। जैसे ही शिव जी ने अपना त्रिशूल शंखचूड़ को मारने के लिए उठाया ठीक उसी समय एक आकाशवाणी हुई कि जब तक श्री हरि का दिया हुआ कवच शंखचूड़ के पास है और जब तक उसकी पत्नी का सतीत्व भंग नहीं होता तब तक शंखचूड़ को मारना असंभव है। इस भविष्यवाणी के बाद विष्णु जी वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर शंखचूड़ के पास गए और उससे वो कवच दान में मांग लिया। शंखचूड़ ने वह कवच निसंकोच ही ब्राह्मण को दे दिया फिर विष्णु जी ने शंखचूड़ का रूप धारण किया और सीधे तुलसी जी के पास पहुंचे। अपने पति को देख तुलसी ने उनका आदर सत्कार किया किन्तु पति के रूप में आए विष्णु जी को स्पर्श करते ही वह समझ गई की वह उसके स्वामी नहीं है। तब क्रोध में आकर उसने विष्णु जी को श्राप दे दिया कि वह एक पत्थर में तब्दील हो जाएं। विष्णु जी ने तुलसी जी को बताया कि उन्होंने विष्णु जी को प्राप्त करने के लिए कई वर्षों तक कठोर तपस्या की है इसलिए अब समय आ गया है कि वह अपने इस शरीर को त्याग कर एक दिव्य शरीर धारण करें।
भगवान ने तुलसी जी से कहा कि उनका यह दिव्य शरीर नदी के रूप में बदला जाएगा और गंडकी नदी के नाम से जाना जाएगा। साथ ही इसी नदी के समीप विष्णु जी भी शालिग्राम शिला के रूप में निवास करेंगे। प्रत्येक वर्ष प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान शालिग्राम व तुलसी का विवाह संपन्न कर मांगलिक कार्यों का प्रारंभ किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि तुलसी- शालिग्राम विवाह करवाने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और साथ ही अतुल्य पुण्य भी मिलता है। 
 


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