कर्नाटक की राम राज्य कथा
| Agency - 17 May 2018

कर्नाटक में भाजपा ने सरकार बना ली है। भाजपा नेता एवं कर्नाटक में पहले भी मुख्यमंत्री रह चुके बी एस येदियुरप्पा ने 17 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इससे पूर्व 15 मई को विधान सभा चुनाव के नतीजे घोषित हुए थे और किसी भी पार्टी को सरकार बनाने के लिए बहुमत नहीं मिला। सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में भाजपा सामने आयी जिसको 104 विधायक मिले। दूसरे स्थान पर सत्तारूढ़ कांग्रेस रही जिसको 78 विधायक मिले और तीवरे स्थान पर जनता दल (एस) रहा जिसको 37 विधायक मिले। जनता दल (एस) के साथ बसपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था, जिसे एक विधायक प्राप्त करने में सफलता मिली। चुनाव नतीजों की घोषणा के दौरान ही कांग्रेस ने बिनाशर्त जनता दल (एस) को समर्थन देकर 116 विधायकों की लिस्ट तैयार करके राज्य पाल वजुभाई वाला से मिलने का समय मांगा। इससे पहले ही भाजपा के बी एस येदियुरप्पा ने राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा कर दिया। दिखाने के लिए लगभग चैबीस घंटे विधिक सलाह मशविरे में बीते और अंत में वही फैसला राज्यपाल ने किया जो लगभग सभी लोग। पहले से जानते थे। राज्य पाल ने भाजपा को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया और 17 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। कांग्रेस और जनता दल के लोग सुप्रीम कोर्ट गये लेकिन वहां भी उनकी बात नहीं सुनी गयी। बाद में वे घरने पर बैठे लेकिन जो होना था, वो तो हो ही गया।
इस प्रकार कर्नाटक की इस राम राज्य कथा में रामायण काल की यादें ताजा हो गयीं। रामायण काल का उल्लेख उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कर्नाटक में चुनाव प्रचार के दौरान भी किया था। उन्होंने कहा था कि भगवान राम को दक्षिण की इसी भूमि पर सहारा मिला था। श्री योगी का संकेत राम-सुग्रीव की मित्रता की तरफ था। भगवान राम ने यहीं पर वानर और भालुओ की सेना को इकट्ठा किया था। इस प्रसंग में तीन प्रमुख पात्र थे- पहले सुग्रीव, दूसरे उनका बड़ा भाई बालि और तीसरे पक्ष में थे भगवान श्री राम। लड़ाई बालि और सुग्रीव की थी लेकिन बालि का वध भगवान श्री राम ने किया तब बालि उनसे पूछता है कि- मैं बैरी सुग्रीव पियारा, कारन कवन नाथ मोहि मारा। आज के संदर्भ में जनता दल (एस) के नेता एचडी कुमार स्वामी भी यही सवाल राज्यपाल बजुभाई वाला से पूछ रहे हैं कि मुझे सरकार बनाने का अवसर क्यों नहीं दिया? मेरे पास तो सरकार बनाने भर का स्पष्ट बहुमत है लेकिन भाजपा को कम से कम 8 विधायकों का जुगाड़ करना है। कर्नाटक की 225 सदस्यीय विधानसभा में 224 पर ही चुनाव होते हैं क्योंकि एक विधायक एंग्लोडेस्यिन मनोनीत किया जाता है। इस बार तो 222 सीटों पर ही चुनाव हुए क्योंकि एक उम्मीदवार की चुनाव के दौरान मौत हो गयी, जबकि दूसरी विधान सभा सीट पर चुनाव इसलिए स्थगित करना पड़ा क्योंकि वहां बड़ी संख्या में मतदाता पहचान पत्र एक घर से बरामद हुए थे। इस प्रकार 112 विधायक सरकार बनाने के लिए चाहिए।
राज्यपाल बजुभाई वाला कहते हैं, यह मेरा विवेक है और संविधान के तहत मैंने काम किया है। भगवान राम ने बालि से कहा था तुम अधर्म पर चल रहे थे और सुग्रीव धर्म का पालन कर रहा था। बालि और सुग्रीव के पिता ने दोनों को बराबर-बराबर राज्य बांटा था लेकिन बालि ने पहले तो सुग्रीव को वहां रखकर भी सत्ता अपने पास रखी और जैसे ही मौका मिला तो सुग्रीव को राज्य से बाहर भगा दिया, उसकी पत्नी को भी रख लिया। जनता दल एस के नेता एचडी देवगौड़ा कह सकते हैं कि मैंने तो ऐसा कोई अत्याचार या अन्याय नहीं किया लेकिन उन्हें कांग्रेस की तरफ देखना चाहिए। कांग्रेस ने यही सब तो किया था। झारखंड में शिबू सोरेन के पास पर्याप्त विधायक नहीं थे लेकिन तत्कालीन राज्य पाल ने कांग्रेस के इशारे पर ही शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी। बाद में शिबू सोरेन बहुमत नहीं साबित कर सके थे। उन्होंने विश्वासमत से पहले ही इस्तीफा दे दिया था। उस समय भाजपा भी अपने विधायकों को खरीद-फरोख्त से बचाने के लिए भाजपाई राज्य में छिपाकर बैठी थी, आज कांग्रेस और जनतादल (एस) के विधायकों को रिसार्ट में रखा जा रहा है। सवाल अत्याचार और अन्याय करने का है। किसी ने एक बार किया तो दूसरा कई बार करेगा।
राजनीति भी तो महासंग्राम की तरह है। अत्याचार करने वाला ही नहीं उसका साथ देने वाला भी मारा जाता है। महाभारत में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और कर्ण अत्याचार से हमेशा दूर रहे लेकिन उन्होंने अत्याचारी कौरवों का साथ दिया। भगवान कृष्ण ने अर्जुन से इसी लिए कहा था कि निहत्थे भीष्म पर तीर चलाओं और महा पराक्रमी कर्ण जब अपने रथ के पहिये को जमीन से निकालने का प्रयास कर रहा था, तब भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उसका वध करने को कहा था। अन्याय करने वाले का साथ देने वाला भी सजा पाता है। कांग्रेस ने पहले जो बोया था, उसी की फसल काटी जा रही हैं कुमार स्वामी के मुख्यमंत्री न बन पाने की यह कथा उसी तरह की है। 
कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला भी उसी परम्परा पर चल रहे हैं। सरकार बनाने के समय उनके लिए सबसे बड़ी बात स्थिर सरकार की है और इसका निर्णय उन्हें स्वयं करना होता है। इसीलिए राज्यपाल ने 16 मई की शाम कांग्रेस और जनतादल (एस) के चुनाव बाद गठबंधन की अन देखी करके भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा को कर्नाटक में नई सरकार गठित करने का निमंत्रण दिया। उन्होंने यह भी कहा कि श्री येदियुरप्पा को 15 दिन के अंदर अपना बहुमत साबित करना होगा। राज्यपाल के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची कांग्रेस को वहां से भी कोई राहत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट ने येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। इतना जरूर हुआ कि देश की सबसे बड़ी अदालत ने भाजपा से समर्थक विधायकों की लिस्ट मांगी है। भाजपा इस प्रकार की सूची बड़ी आसानी से दे सकती है। उधर, कांग्रेस ने राज्यपाल के फैसले के विरोध में सड़क पर संघर्ष शुरू कर दिया। कांग्रेस के सभी विधायक बेंगलुरू के फ्रीडम पार्क में धरने पर बैठे। इस घटने में जनता दल (एस) के विधायक भी बैठे और सबसे महत्वपूर्ण यह कि पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा भी धरने में शामिल हुए। कांग्रेस और जनता दल (एस) ने भाजपा पर विधायकों की खरीद फरोख्त का आरोप लगाया है जो इससे पहले भी किसी पार्टी को बहुमत न मिलने पर विपक्ष के लोग लगाते रहे हैं। यह आरोप लगाने वाले जब इस तरह से सरकार बनाते थे, तब उन पर भी इसी प्रकार का आरोप लगता था। इसकी सच्चाई से भाजपा, कांग्रेस और जनता दल (एस) के नेता अच्छी तरह से वाकिफ भी है। इसी लिए कांग्रेस और जनता दल (एस) ने अपने-अपने विधायको को कब्जे में रखने के लिए सुरक्षित जगह पर रखा है। इसके बावजूद बताया गया कि दोनों पार्टियों के कुछ विधायक उनके सम्पर्क में नहीं हैं। कर्नाटक हैदराबाद क्षेत्र से कांग्रेस विधायक प्रताप गौड़ा पाटिल का नाम इनमें शामिल है हालांकि उन्होंने समर्थन पत्र पर हस्ताक्षर किये थे।
कांग्रेस के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्ध रमैया कहते हैं कि इस लोकतंत्र पर उन्हें भरोसा नहीं है। सवाल उठता है कि इस लोकतंत्र को बनाया किसने था? कांग्रेस ने जिस परम्परा को डाला था, उसी पर राज्यपाल चल रहे हैं। यह बात किसे नहीं मालूम की भाजपा 104 विधायकों के सहारे बहुमत साबित करने का करिश्मा किस प्रकार करेगी लेकिन राजनीति और चुनाव प्रक्रिया में जो कर्मबीज बोये गये तो कर्मफल भी उनका मिलेगा। 
 


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