योगी का मदरसा सुधार अभियान
| Agency - 24 May 2018

सुधार के कार्यक्रम विस्तृत सोच और दूरगामी परिणामों के लिए बनाये जाते हैं। इन पर जब हम सीमित दृष्टिकोण से प्रतिक्रिया देते हैं तो कार्यक्रम का उद्देश्य पर्दे के पीछे हो जाता है और तर्क-वितर्क होने लगते हैं। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने मदरसांे को लेकर एक ऐसा ही कार्यक्रम बनाया है। इसे कानूनी जामा भी पहनाया जा सकता है क्योंकि कैबिनेट की बैठक में कई फैसलों के साथ मदरसों को शिक्षा की मुख्यधारा में शामिल करने की भी बात कही गयी है। मदरसा अल्पसंख्यक मुसलमानों के स्कूल हैं। हालांकि ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है कि इन मदरसों में किसी अन्य धर्म के बच्चे शिक्षा नहीं ग्रहण कर सकते लेकिन उच्च शिक्षा तक धार्मिक वर्चस्व बना रहता है जैसे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में मुस्लिम धर्म के बच्चे ही ज्यादा हैं। हिन्दू धर्म की इसे तारीफ न समझी जाए तो कहा जा सकता है कि बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) में अन्य धर्म के छात्र-छात्राएं भी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं जबकि इस विश्वविद्यालय के नाम के साथ हिन्दू जुड़ा है। योगी का मदरसा सुधार कार्यक्रम संकीर्णता से न देखा जाए।
शिक्षा हमारे शरीरिक एवं मानसिक व्यक्तित्व का विकास करती है। इस प्रकार का व्यक्तित्व विकसित होने से हम भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति कर सकते हैं। विभिन्न विषयों का ज्ञान अर्जित कर हम डाक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, राजनेता, पुलिस प्रशासन में अफसर आदि बनते हैं। विशुद्ध धार्मिक शिक्षा के अवसर भी हमें मिलते हैं लेकिन इससे पूर्व हमें सभी विषयों का ज्ञान होना जरूरी है। मदरसों को लेकर हालांकि मुस्लिम वर्ग से तर्क यही आता है कि वहां हर प्रकार की शिक्षा दी जाती है लेकिन व्यावहारिक रूप से धर्म के बारे में ही बच्चों को जानकारी मिलती है। मदरसों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए लगातार अभियान चला है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे ठोस धरातल पर उतारने का फैसला किया है। केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भी देश भर में शिक्षा की एकरूपता स्थापित करने का फैसला किया है। इसके लिए सभी स्कूलों में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की पाठ्य पुस्तकें पढ़ाई जाएंगी। इन पाठ्य पुस्तकों में बच्चों की उम्र के लिहाज से विषय शामिल किये गये और यह प्रयास किया गया कि बच्चे रोचकता के साथ ज्ञान प्राप्त कर सकें। प्रारंभिक शिक्षा इसी तरह की होती है। छोटे बच्चों को जिस तरह हम आम का फल दिखाकर बड़ा आ पढ़ाते हैं अथवा सेब (एप्पल) दिखाकर अंग्रेजी का ए पढ़ाते हैं उसी तरह इतिहास भूगोल, समाज विज्ञान, भौतिक, रसायन और गणित की शिक्षा देने का प्रयास किया गया है। बच्चों की जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, वैसे वैसे ही उनके पाठ्य विषय गंभीर होते हैं।
काफी सोच-विचार के बाद एनसीईआरटी ने ये पाठ्य पुस्तकें तैयार की हैं और अल्पसंख्यक समुदाय की भाषा का भी ध्यान रखा गया है स्थानीय अथवा क्षेत्रीय भाषा में ज्ञान प्राप्त करना बच्चों के लिए काफी सुविधाजनक रहता है। पश्चिम बंगाल में बांग्ला तो कर्नाटक में कन्नड़ भाषा में ही बच्चे आसानी से सीखेंगे लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी और अंग्रेजी के महत्व को स्वीकार करना ही पड़ेगा। हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है और अंग्रेजी को इन्टरनेशनल भाषा माना गया है। इसलिए एनसीईआरटी की पाठ्य पुस्तकों में उत्तर प्रदेश के हित में मदरसों के लिए उर्दू के साथ हिन्दी और अंग्रेजी भाषा को भी अनिवार्य कर दिया गया है। यह फैसला भी प्रदेश की भाजपा सरकार ने मदरसों पर थोपा नहीं है बल्कि उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड ने ही इस प्रकार का प्रस्ताव बनाया है जिस पर योगी सरकार की कैबिनेट ने मुहर लगा दी है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में गत दिनों हुई कैबिनेट बैठक में 11 महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी दी गयी। बैठक के बाद राज्य सरकार के प्रवक्ता स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह और ऊर्जामंत्री श्रीकांत शर्मा ने इस बारे में जानकारी दी थी। श्रीकांत शर्मा ने बताया कि कैबिनेट ने उत्तर प्रदेश में अशासकीय अरबी और फारसी मदरसा मान्यता प्रशासन एवं सेवा नियमावली 2016 में संशोधन प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस संशोधन के तहत अब मदरसों में दीनी तालीम के साथ ही अरबी, फारसी शिक्षा उर्दू, अरबी और फारसी में देने के अलावा गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, कम्प्यूटर आदि की शिक्षा उर्दू अंग्रेजी और हिन्दी में देने का निर्णय लिया गया है। इस संशोधन के बाद अब मदरसों में अरबी फारसी और उर्दू के साथ हिन्दी और अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दी जा सकेगी।
इस प्रकार मदरसों के शिक्षा क्षेत्र में कोई कटौती नहीं की गयी है बल्कि उसे और बढ़ाया गया है। उत्तर प्रदेश जैसे हिन्दी भाषी राज्य में कितने ही मुसलमान ऐसे होंगे जिनके परिवार में अरबी फारसी का ज्ञान तो दूर की बात है, वहां आपस में इन भाषाओं को बोला भी नहीं जाता। बोलचाल की भाषा हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू रहती है ऐसी उर्दू तो आमतौर पर सभी बोलते और समझते हैं। इसलिए मदरसों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी और हिन्दी को बनाया जा रहा है। इससे मदरसों की लोकप्रियता बढ़ेगी और ज्यादा बच्चे वहां शिक्षा प्राप्त करने का प्रयास करेंगे। इस प्रकार मदरसे एक सीमित दायरे से बाहर निकलेंगे और शिक्षा की मुख्यधारा मंे शामिल हो सकेंगे। मुस्लिम धर्म के अलावा अन्य धर्मो के बच्चे भी वहां शिक्षा ले सकते हैं। मदरसों में दोनों शिक्षा (धार्मिक शिक्षा) के महत्व को बरकरार रखा गया है। दीन अर्थात धर्म कभी भी दुर्भावना नहीं पैदा करता। सभी धर्म नेकी की राह पर चलना सिखाते हैं लेकिन हम अपने स्वार्थ के चलते धर्म को भी संकुचित कर देते हैं और यह धर्म की संकीर्णता नहीं बल्कि हमारे विचारों की संकीर्णता अर्थात छोटापन होता है। यही विचारों की संकीर्णता योगी आदित्यनाथ की सरकार के फैसले पर भी सवाल खड़ा कर सकती है। मदरसों की स्वायत्तता पर कोई प्रहार नही किया गया है लेकिन भाजपा के बारे में यह पूर्वाग्रह है कि वह मुस्लिम और ईसाई विरोधी है। अभी हाल में एक पादरी ने अजीबोगरीब अपील जारी कर दी थी कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले सभी लोग शांति की प्रार्थना करें। इसके पीछे भावना यही थी कि 2014 की तरह यदि 2019 में भी केन्द्र में भाजपा की सरकार बनी तो शांति खतरे में पड़ जाएगी केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इस बात का जोरदार खंडन किया और उन्होंने कहा कि 2014 में जब से भाजपा की सरकार बनी है, तब से ही सभी का साथ, सबका विकास के सिद्धांत पर सरकार चल रही है। देश के अंदर रहने वाले सभी अल्पसंख्यकों को पूरी सुरक्षा और सम्मान दिया जाता है और भविष्य में भी मिलता रहेगा। इस तरह की अफवाह फैलाने वालों से सावधान रहने की जरूरत है। उत्तर प्रदेश में सरकार ने मदरसा बोर्ड के जिस प्रस्ताव को लेकर कैबिनेट में मंजूरी दी है, उसको दूरदर्शिता से देखने की जरूरत है। मदरसों की स्थिति कूपमंडूकता की हो गयी थी, उससे बाहर निकालने के लिए इस तरह के प्रयास करना ही सार्थक होगा। (हिफी)
 


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