प्रणव दा को लेकर संघ की फिरकी
| Agency - 31 May 2018

राजनीति में अपने विरोधी पर कभी-कभी इस तरह से प्रहार किया जाता है कि वार भरपूर होता है लेकिन आवाज नहीं होती। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक सामाजिक संगठन है और प्रत्यक्ष रूप से राजनीति से उसका कोई मतलब नहीं लेकिन सभी को पता है कि उसकी राजनीतिक शाखा कभी जनसंघ थी जो आज भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कहलाती है। भाजपा को शिखर तक लाने में संघ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और उसके लिए आरएसएस कभी-कभी ऐसी फिरकी फेंकता है कि भाजपा के विरोधी उसमें बुरी तरह उलझ जाते हैं। भाजपा ने देश को कांग्र्रेस मुक्त करने का लक्ष्य तय किया है। इसके लिए कई स्तरों पर कार्य हो रहा है। एक स्तर कांग्रेस के नामचीन नेताओं को अपने पक्ष में खड़ा करना भी है। इसी के तहत भाजपा ने प्रणव मुखर्जी पर तब से डोरे डाले, जब से वे राष्ट्रपति थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनकी तारीफों के पुल बांधे और अब भाजपा की नजर पश्चिम बंगाल पर लगी है तो संघ के माध्यम से भाजपा ने प्रणव मुखर्जी को एक कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनवा दिया। इससे कांग्रेस के नेता बेचैन हो गये हैं। प्रणव मुखर्जी का आरएसएस के कार्यक्रम में शामिल होना पश्चिम बंगाल तक अपना प्रभाव दिखा सकता है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के नागपुर स्थित मुख्यालय में आरएसएस के शिक्षा वर्ग का एक बड़ा कार्यक्रम होने वाला है। इस तरह के कार्यक्रम वहां होते ही रहते हैं और आमतौर पर संघ प्रमुख ही उनकी अध्यक्षता करते हैं। संघ के शिक्षा वर्ग के तृतीय वर्ष शामिल हो रहे स्वयं सेवकों को इस बार पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी संबोधित करेंगे। डा0 मुखर्जी इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि होंगे। मुखर्जी पूर्व राष्ट्रपति हैं और किसी विशेष राजनीतिक दल से उनकी सम्बद्धता तो बहुत पहले खत्म हो गयी थी। इसके बावजूद वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे हैं और उनकी पहचान भी इसी रूप में है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में प्रणव मुखर्जी को चाहने वाले बड़ी संख्या में अब भी मौजूद हैं। इसीलिए कांग्रेस के नेताओं को यह बात अच्छी नहीं लग रही है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने संघ को एक साम्प्रदायिक संगठन के रूप में प्रचारित कर रखा है। विपक्षी दलों की एकता में शामिल वहां के वामपंथी और राज्य में सरकार चला रहीं सुश्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस भी इसी मुद्दे को उठाती रही है। प्रणव मुखर्जी ने संघ के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनकर जाने से कांग्रेस का संघ पर आरोप कमजोर हो रहा है। यह कार्यक्रम आगामी 7 जून को होना है और कांग्रेस के नेता चाहते हैं कि किसी तरह प्रणव दा इस कार्यक्रम में न पहुंचे। इसलिए कांग्रेस इतिहास के पन्ने पलट रही है। कांग्रेस के नेता कहते हैं कि प्रणव मुखर्जी ने ही आरएसएस को साम्प्रदायिक ही नहीं बल्कि आतंकवादियों से उसके संबंध को भी जोड़ा था। कांग्रेस नेता याद दिलाते हैं कि 2010 में जब बुराडी में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ तब श्री प्रणव मुखर्जी ने ही यह प्रस्ताव आगे बढ़ाया था कि आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठनों के आतंकवादियों से संबंध की यूपीए सरकार जांच करे। इस प्रकार संघ के बारे में प्रणव मुखर्जी इस तरह का प्रस्ताव देने के बाद उसी के कार्यक्रम मंे क्यों जा रहे हैं? कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी कहते हैं कि इसके बारे में पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ही जवाब दे सकते हैं क्योंकि उनको निमंत्रण मिला है और पता चला है कि वह जा भी रहे हैं। इसी क्रम में पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुशील कुमार शिंदे कहते हैं कि पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी एक बुद्धिमान व्यक्ति हैं वह भारत के राष्ट्रपति रहे हैं और उनकी सोच पंथ निरपेक्ष रही है इसलिए ऐसा नहीं लगता कि उनके वहां जाने से उनके व्यवहार में कोई बदलाव आएगा। इस प्रकार कांग्रेस के नेताओं को प्रणव मुखर्जी का नागपुर में संघ के कार्यक्रम में जाना कांग्रेस के हित में नहीं लग रहा है लेकिन वे खुलकर इसका विरोध भी नहीं कर सकते जैसा कि मनीष तिवारी और सुशील कुमार शिंदे की प्रतिक्रिया से स्पष्ट होता है। संघ और भाजपा की यही वीरघातिनी शक्तियां हैं जो अपना वार अचूक होकर करती हैं। कांग्रेस और विपक्षी दल के अन्य नेता वहां तक सोच भी नहीं पाते। कांग्रेस ने अपने अनुषांगिक संगठनों के कार्यक्रम में अब तक भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी या डा0 मुरली मनोहर जोशी जैसे नेताओं को बुलाने की भी जरूरत नहीं समझी। दरअसल इस प्रकार की रणनीति दूसरे राजनीतिक दलों के पास नहीं है। संघ के अनुषांगिक संगठन विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) ने रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन को भी एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया है।भाजपा ने एक अन्य अभियान भी इसी तरह का चलाया है जिसमें पार्टी के दिग्गज नेता ऐसे लोगों से मिलेंगे जिनका राजनीति से प्रत्यक्ष संबंध नहीं है लेकिन मतदाताओं को वे प्रभावित करने की भरपूर क्षमता रखते हैं। भाजपा का यह अभियान ‘संपर्क फार समर्थन’ के नाम से शुरू हुआ है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह इसी अभियान के तहत गत दिनों हरियाणा के गुरुग्राम (गुड़गांव) पहुंचे और पूर्व थल सेना अध्यक्ष दलवीर सिंह सुहाग और उनके परिजनों से मिले। शाह ने इसी अभियान के तहत कानून विशेषज्ञ सुभाष कश्यप से भी मुलाकात की। इस प्रकार भाजपा नेता प्रतिष्ठित लोगों से मिलकर मोदी सरकार की चार साल की उपलब्धियां बताते हैं। अभियान के तहत भाजपा के राष्ट्रीय पदाधिकारी देश के जाने-माने लोगो से संपर्क करेंगे। इन लोगों में नौकरशाह (सेवा निवृत्त) पूर्व सेनाधिकारी, विद्वान और अन्य क्षेत्र की जानी मानी हस्तियां शामिल हैं। भाजपा के मुख्यमंत्रियों, केन्द्रीय मंत्रियों से लेकर पंचायत सदस्यों तक इसके चार हजार सदस्य 15 दिन के अंदर लगभग एक लाख लोगों से सम्पर्क करेंगे। भाजपा और संघ के ये ऐसे दांव हैं जिनकी काट ढूंढ पाना मुश्किल हो जाता है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को लेकर भाजपा पश्चिम बंगाल में। उनके समर्थकों की सहानुभूति प्राप्त करना चाहती है। प्रणव मुखर्जी पश्चिम बंगाल के प्रभावी नेता तो रहे लेकिन कांग्रेस ने उन्हें काफी देर में प्राथमिकता दी। प्रणव मुखर्जी ने गठबंधन की सरकारों और सियासत के दौरान के अनुभव एक पुस्तक में भी लिखे हैं। श्रीमती इंदिरा गांधी के समय पश्चिम बंगाल की राजनीति में श्री प्रणव मुखर्जी की जगह सिद्धार्थ शंकर रे को आगे बढ़ाया गया है। इस प्रकार प्रणव दा अपने को कांग्रेस में उपेक्षित समझते रहे। हालांकि कांग्रेस ने उन्हें बाद में राष्ट्रपति जैसे सर्वाेच्च पद पर बैठाया। इससे पूर्व श्रीमती सोनिया गांधी ने प्रणव मुखर्जी को काफी महत्व दिया और अक्सर उनसे सलाह मशविरा भी वे करती थीं। एक समय तो ऐसा आया जब 2004 में श्रीमती सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार किया और मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया, उस समय श्री प्रणव मुखर्जी को प्रधानमंत्री बनाने की बहुत चर्चा हुई थी। कांग्रेस अपने इतिहास का फायदा भले ही न उठा पा रही हो लेकिन संघ उसका भी फायदा उठा रहा है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को अपने कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनाना उसकी इसी रणनीति का एक हिस्सा है। 
 


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