अद्भुत है कैलाश मानसरोवर 
| Agency - 05 Jun 2018

भगवान शिव सबसे निराले देव हैं। इन्द्र की इन्द्रसभा तो वैभव और विलास के लिए जानी ही जाती है, भगवान विष्णु भी क्षीरसागर मंे शेषनाग की शैया पर विश्राम करते हैं लेकिन भगवान शिव कभी श्मशान मंे विचरण करते हैं तो निवास के लिए चुना कैलाश पर्वत जहां बर्फ ही बर्फ जमा है। यह बर्फ परिपूर्णता का प्रतीक है। यहीं पर मानसरोवर झील है जहां हंस निवास करते हैं। बहुत श्रम साध्य है कैलाश मानसरोवर की यात्रा, फिर भी श्रद्धालु बहुत उत्साह के साथ वहां जाते हैं कैलाश मानसरोवर यात्रा 8 जून से शुरू हो रही है। पुराणों के अनुसार शिवजी का स्थायी निवास होने के कारण इस स्थान को 12 ज्येतिर्लिंगों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। कैलाश मानसरोवर समुद्र सतह से 22068 फुट ऊंचा है तथा हिमालय के उत्तरी क्षेत्र में तिब्बत में स्थित है। दुनिया का सबसे ऊंचा शिवधाम कैलाश मानसरोवर की यात्रा शुरू हो रही है।  इस वर्ष यह यात्रा 8 जून से शुरू होकर 8 सितंबर तक चलेगी। यात्रा के लिए आयु कम से कम 18 वर्ष और अधिक से अधिक 70 वर्ष तक होनी चाहिए। पुराणों के अनुसार शिवजी का स्थायी निवास होने के कारण इस स्थान को 12 ज्येतिर्लिंगों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। कैलाश मानसरोवर समुद्र सतह से 22068 फुट ऊंचा है तथा हिमालय के उत्तरी क्षेत्र में  तिब्बत में स्थित है। क्योंकि तिब्बत चीन के अधीन है अतः कैलाश चीन में आता है। मानसरोवर झील से घिरा होना कैलाश पर्वत की धार्मिक महत्ता को और अधिक बढ़ाता है। प्राचीन काल से विभिन्न धर्मों के लिए इस स्थान का विशेष महत्त्व है। इस स्थान से जुड़े विभिन्न मत और लोक कथाएं केवल एक ही सत्य को प्रदर्शित करती हैं कि ईश्वर ही सत्य है, सत्य ही शिव है। हर साल कैलाश मानसरोवर की यात्रा करने हजारों साधु-संत, श्रद्धालु दार्शनिक यहां इकट्ठे होते हैं। यह जगह काफी रहस्यमयी बताई गई है। मृदंग की आती है आवाज-कहा जाता है गर्मी के दिनों में जब मानसरोवर की बर्फ पिघलती है, तो एक प्रकार की आवाज आपको लगातार सुनाई देती है। श्रद्धालुओं का मानना है कि यह आवाज मृदंग की होती है। मान्यता यह भी है कि कोई व्यक्ति मानसरोवर में एक बार डुबकी लगा ले, तो वह ‘रुद्रलोक’ पहुंच सकता है।
देवी सती का दायां हाथ इसी स्थान पर गिरा था, माना जाता है जिससे यह झील तैयार हुई। इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उसका रूप मानकर पूजा जाता है। इसलिए इसे 51 शक्तिपीठों में से एक माना गया है। मानसरोवर झील और राक्षस झील, ये दोनों झीलें सौर और चंद्र बल को प्रदर्शित करती हैं जिसका संबंध सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा से है। जब आप इन्हें दक्षिण की तरफ  से देखेंगे तो एक स्वस्तिक चिन्ह बना हुआ दिखेगा। इस अलौकिक जगह पर प्रकाश तरंगों और ध्वनि तरंगों का समागम होता है, जो जैसा सुनाई देता है। मानसरोवर में बहुत सी खास बातें आपके आसपास होती रहती हैं, जिन्हें आप केवल महसूस कर सकते हैं। झील लगभग 320 किलोमीटर के क्षेत्र में फैली हुई है। इस झील के आसपास सुबह के 2ः30 से 3ः45 बजे के बीच यहां आप जोर-शोर से अपने आसपास कई क्रियाएं होते सुनेंगे जो केवल आप महसूस कर सकते हैं। मान्यता है कि इस सरोवर का जल आंतरिक स्रोतों के माध्यम से गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी में जाता है। पुराणों के अनुसार शंकर भगवान द्वारा प्रकट किए गए जल के वेग से जो झील बनी, उसी का नाम मानसरोवर हुआ था। मानसरोवर पहाड़ों से आते हुए यहां पर एक झील है, पुराणों में इस झील का जिक्र ‘क्षीर सागर’ से किया गया है। क्षीर सागर कैलाश से 40 किमी की दूरी पर है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी इसी में शेष शैय्या पर विराजते हैं। लोगों की इस झील में बहुत श्रद्धा है।
 भगवान शिव की पहली पत्नी थीं सती, शिव और सती एक दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। ऐसा क्या हुआ कि भगवान शिव को अपनी प्रिय पत्नी का त्याग करना पड़ा। वनवास के दौरान जब माता सीता का हरण रावण ने कर लिया था तो उस समय राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ सीता की खोज में लगे हुए थे। उसी समय कैलाश पर्वत पर माता सती अपने पति महादेव के साथ बैठी हुई थीं। राम को पत्नी वियोग में तड़पता हुआ देखकर सती के मन में एक खयाल आया कि राम तो स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं वे इस तरह एक स्त्री वियोग में वन में मारे-मारे क्यों फिर रहे हैं। यदि वे चाहें तो अवश्य ही रावण का पता लगाकर तुरंत उसे मार सकते हैं। सती ने ये सवाल भगवान शिव से पूंछा, तब महादेव ने बताया कि हां, यह सत्य है कि राम भगवान विष्णु के अवतार हैं लेकिन उन्होंने पृथ्वी पर एक मनुष्य के रूप में जन्म लिया है इसलिए उन्हें भी अन्य मनुष्यों की तरह एक साधारण व्यक्ति की तरह सभी कष्टों से गुजरना होगा। तब सती जी ने कहा कि क्या मनुष्य रूप में भी उनके अंदर वह गुण मौजूद हैं जो भगवान विष्णु के अंदर हैं।
शिवजी ने उनकी शंका का समाधान करते हुए कहा कि हां, एक मनुष्य होते हुए भी श्रीराम उन सभी गुणों से परिपूर्ण हैं जो भगवान विष्णु के अंदर मौजूद हैं। माता सती ने इस पर संदेह प्रकट करते हुए कहा कि मुझे तो यह संभव नहीं लगता क्योंकि यदि उनके अंदर वह कलाएं होतीं तो वे आज सीता की तलाश में वन-वन नहीं भटकते। सती ने निश्चय किया कि वे भगवान राम की परीक्षा लेंगी और उन्होंने अपने पति भगवान शिव से इसकी आज्ञा मांगी पहले तो शिवजी ने सती को ऐसा करने से मना किया लेकिन बाद में वे उनकी हठ के आगे हार गए और शिवजी ने सती को श्रीराम की परीक्षा लेने की इजाजत दे दी। भगवान राम की परीक्षा लेने के लिए माता सती ने देवी सीता का रूप धारण किया और उसी रास्ते पर बैठ गईं जहां से राम और लक्ष्मण निकलने वाले थे। जब राम और लक्ष्मण वहां से निकले तब लक्ष्मण की नजर देवी सीता का रूप धारण की हुई माता सती पर पड़ी और लक्ष्मण उन्हें ही सीता समझकर प्रसन्न हो गए। जब राम की नजर माता सती पर पड़ी तब उन्होंने हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए कहा कि माता क्या आज आप अकेले ही वन विहार पर निकली हैं ? मेरे प्रभु भगवान शिव को आज कहां छोड़ आई हैं। राम के वचन सुनकर सती लज्जित हुईं और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर राम-लक्ष्मण को सफलता का आशीर्वाद देते हुए वहां से अंतध्र्यान हो गईं। जब शिव जी ने सती से पूछा कि क्या तुमने श्रीराम की परीक्षा ली थी तब माता सती ने उनसे कहा कि उन्होंने श्रीराम की कोई भी परीक्षा नहीं ली। परन्तु महादेव ने अपनी दिव्य दृष्टि से सब कुछ देख लिया। सती ने माता सीता का रूप लेकर राम की परीक्षा ली थी इसलिए भगवान शंकर ने मन ही मन सती का त्याग कर दिया। 
 


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