ओली का ड्रैगन से मोहभंग
| Agency - 23 Jun 2018

बीजिंग। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली की भारत के साथ रिश्तों में  पुरानी गर्मजोशी वापस आ रही है। चीन में अब उतनी दिलचस्पी नहीं दिखलाई पड़ती है। 2016 में चीन के दौरे पर प्रधानमंत्री ओली ने जो अहम समझौते किए थे, उनके क्रियान्वयन की गति काफी धीमी हो चली है। दो साल पहले जिन समझौतों को ऐतिहासिक और गेम चेंजिंग बताया गया था, ओली के दूसरे चीन दौरे में उन पर बात आगे नहीं बढ़ी। नेपाल के नए संविधान को लेकर भारत ने विरोध किया था. 2015-16 में भारत-नेपाल सीमा पर हुए ब्लॉकेड की प्रतिक्रिया में नेपाल प्रमुख ओली ने चीन के साथ ट्रांजिट और ट्रांसपोर्ट समझौते पर हस्ताक्षर किए. नेपाल के इस कदम के सैद्धान्तिक मायने महत्वपूर्ण थे. इसका मतलब था कि नेपाल की आपूर्ति व्यवस्था पर भारत के एकाधिकार की समाप्ति. बॉर्डर पर हुए ब्लॉकेड से नेपालियों की दैनिक जरूरतों की चीजों की आपूर्ति का संकट पैदा हो गया था जिससे वहां का आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया था। नेपाल की सरकार पर यह दबाव बढ़ा कि भारत पर पूरी तरह से देश की आपूर्ति व्यवस्था की निर्भरता कम की जाए और अन्य देशों के साथ रिश्ते मजबूत किए जाएं। चीन से नेपाल की करीबी बढ़ाने के लिए ओली को हर तरह से समर्थन मिला. जब वह ऑफिस से बाहर हुए थे तो उन्होंने अपने बाद आने वाले प्रधानमंत्रियों पुष्प दहल और शेर बहादुर देउबा की यह कहकर आलोचना की कि उनके कार्यकाल में चीन के साथ हुए समझौतों को वे लागू नहीं कर पाएं. लेकिन अब तक ओली खुद ही इन समझौतों को लागू करने की दिशा में बहुत आगे नहीं बढ़ पाए हैं। (
 


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