सियासत में पिसता कश्मीर
| Agency - 30 Jun 2018

कश्मीर का भारत में सशर्त विलय आज भी गले की फाँस बना हुआ है। यदि भारत सरकार राजनीति से परे हटकर शुद्ध हृदय से इसका समाधान निकालती तो कश्मीर कभी का भारतीय गणराज्य का अंग बन गया होता और आत्मसंतोष के लिये बार-बार ये कहना न पड़ता कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। दरअसल जाति एवं संप्रदाय की राजनीति ने भारत को खोखला बना दिया है। कश्मीर में एक विशेष संप्रदाय का बाहुल्य है और उनको खुश रखने का अर्थ है कि हम अल्पसंख्यक संप्रदाय के सबसे बड़े हितैषी हैं। बस इसी भावना एवं रणनीति पर सभी सरकारों का फोकस रहा। फलस्वरूप कश्मीरी पंडित लुटते-पिटते एवं बेघर होते रहे। हमारे नेताओं में कुर्सी पे्रम की जगह राष्ट्र पे्रम होता तो हालात ऐसे न होते। आज जिस प्रकार मोदी को हटाने हेतु महागठबंधन बनाया गया है क्या पहले नहीं बन सकता था जब बेकसूर व बेबस कश्मीरी पंडित प्रदेश से निकाले जा रहे थे? मुफ्ती मुहम्मद सईद के कार्यकाल में जो आतंकवादी छोड़े गये थे उसी के बाद से आतंकी घटनाओं में निरंतर वृद्धि होती ही जा रही है। जाति व संप्रदायवादी राजनीति के चलते ही आज हमारे ही घरों में आतंकवाद पनप रहा है और आतंकी आस्तीन के साँप की तरह देश के हर प्रांत में पनाह पा रहे हैं। जो गाहे-बगाहे हमें डसते ही रहते हैं। बावजूद इसके नेताओं का कुर्सी प्रेम समाप्त नहीं हो रहा है। ये बात अलग है कि हाथी के दिखावटी दांतों की तर्ज पर वे देश पर निछावर होने की कसमें खाते रहते हैं। सभी जानते हैं कि अदालतों में गीता व रामायण की कसमें खाने वाले कितना सच बोलते हैं? पाकिस्तान ने सैन्यबल के बूते लगभग आधा कश्मीर हथिया रखा है उसे अपने दम-खम के बल पर लेना हमारा संवैधानिक अधिकार भी है। किन्तु ऐसा प्रयास इसलिये नहीं किया गया कि हम स्वयं को शाँति का पुजारी सिद्ध करने का ढोंग करते हैं। वार्ताओं से समस्या का हल निकल सकता तो कश्मीर की समस्या कभी की समाप्त हो जाती। किन्तु पाकिस्तान के आकाओं ने अपनी जनता को विश्वास दिला रखा है कि भारत के कब्जे वाला कश्मीर हर हाल में हथिया लेंगे। सैन्यबल से नहीं बल्कि कूटनीतिक चालों के बल पर। और चालें चलने में उसने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। अब तो हालात ऐसे हो चले हैं कि आम जनता को कश्मीर का लालीपाप थमाने के वादे पर चुनाव लड़े जाते हैं।
दोनों कश्मीर के निवासी रिश्तों की डोर में बंधे हैं व एक दूसरे से मिलने के लिये बेताब रहते हैं। किन्तु ऐसा हो जाये तो दोनों देशों के नेताओं की राजनीति ठंडी पड़ जायेगी और कुर्सी के दीवाने नेतागण राजनीति को सदैव गर्माये रखना चाहते हैं। कटु सत्य तो ये है कि कश्मीरी दो पाटों के बीच में बुरी तरह पिस रहे हैं। बात विलय की करें तो राजा हरी सिंह ने सशर्त ही सही किन्तु पूरे कश्मीर के विलय की घोषणा की थी पर हमारी कमजोर रणनीति का फायदा उठाकर पाक सेना ने आधा कश्मीर हमसे छीन लिया। पीड़ा तो इस बात की है कि आज विश्व की महाशक्तियों में शुमार होने का दावा करने वाले हमारे दो मुँहें नेता सिर्फ जुबानी जंग लड़ रहे हैं और गुरिल्ला युद्ध में सेना के जवानों से अधिक आम नागरिक मारे जा रहे हैं। ऐसे में विश्व समुदाय बेगुनाहों के मारे जाने की भत्र्सना करता है तो गलत क्या है? इस आरोप से बचने का एकमात्र रास्ता यही है कि जिस प्रकार उन्होंने कश्मीर, छीना है उसी तर्ज पर हम उसे वापस ले लें। सरदार पटेल इरादों के पक्के न होते तो आज हैदराबाद भी नासूर बनकर रिस रहा होता। पटेल ने खंड-खंड हो रहे भारत को अखंड बनाया। दूसरे देश पर हमला नहीं किया। उसी तर्ज पर हम खंडित कश्मीर को पुनः एक कर लेते हैं तो ये हमारे अधिकार क्षेत्र की ही बात है। विश्व समुदाय इसकी मजम्मत नहीं कर सकता। किसी ने दुस्साहस किया भी तो उसका मुंहतोड़ जवाब देना ही मर्दानगी है। महाशक्ति बनने के जुमले उछालना गीदड़ भभकी के सिवा कुछ नहीं है जब तक उसे सिद्ध न कर दिया जाय। आज केंद्र के अलावा अधिकांश प्रांतों  में एक ही पार्टी की सरकार है। संयोगवश कश्मीर में भी राष्ट्रपति शासन लागू है और तीनों सेनाध्यक्ष अदम्य साहस और देश प्रेम से लबरेज हैं। पाक अधिकृत कश्मीर वापस लेने का इससे सुनहरा अवसर हो ही नहीं सकता बशर्ते इस पर राजनीति न की जाये।
हमारी मजबूरी ये है कि धारा 370 एवं उसकी उपधाराओं के चलते देश के किसी भी प्रांत का निवासी न तो वहां का नागरिक बन सकता है और न ही वहां एक इंच जमीन खरीद सकता है। बस इसी का फायदा उठाकर पड़ोसी देश ने इस्लाम के नाम पर कश्मीरियों को भड़काया कि कश्मीरी पंडितों को इस्लाम कबूल करने पर मजबूर करो या घाटी से निकाल बाहर करो। उसकी चाल रंग लायी और कश्मीरी पंडितों से खाली हुई घाटी को वर्ग विशेष से पाट दिया गया चाहे वो बांग्लादेशी मुसलमान हों अथवा पाकिस्तानीं। वहा की विधानसभा पर हमारे संविधान का अंकुश नगण्य है। अतः वे बेखौफ होकर वहां बस गये। वे भारतीय मुसलमान तो हैं नहीं, अतः जिसकी कृपा से वहां बसे हैं उसी की जय बोलते हैं तो आश्चर्य कैसा? बात बेरोजगारी की करें तो कश्मीरी सीधे-सादे व शांत प्रकृति के होते हैं। फल-फूल कसीदाकारी, केसर की खेती और सैलानियों से होने वाली आय से ही संतुष्ट थे किन्तु जब से बांग्लादेशी व पाकिस्तानी मुसलमानों की भीड़ घाटी में आबाद है, लूट-मार, हत्या व बलात्कार की घटनायें बढ़ी हंै। लुटेरे रोजगार के अवसर पैदा करेंगे अथवा लूटमार करेंगे? इसे आसानी से समझा जा सकता है। भारत सरकार इसे रोकने में इसलिये असमर्थ है कि वहां की विधानसभा सदैव से ही घाटी के इस्लामीकरण की पक्षधर रही है। और भारत सरकार का रोल इतना ही रहा है कि सेना के बल पर पाकिस्तानी हमलावरों से उनकी रक्षा करे। चैकीदार की हैसियत इससे ज्यादा हो भी नहीं सकती। भारत सरकार की कोशिश, बुरी तरह फेल हुई। शेख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, मुफ्ती मुहम्मद सईद, गुलाम नबी आजाद और महबूबा मुफ्ती सभी ने धारा 370 की आड़ में भारत सरकार को ब्लैकमेल ही किया है। स्वतंत्र राज्य की मांग भी इसी रणनीति का हिस्सा है। सच तो ये है कि आज भी वो स्वतंत्र है और भारत सरकार उसकी भरपूर सहयोगी है। फिर उद्योग और नौकरी का ठीकरा भारत सरकार के मत्थे फोड़ने का क्या औचित्य है? यदि विकास चाहिये तो कश्मीर को भारतीय संविधान के अंतर्गत आना ही होगा। मुफ्त की रोटी तोड़ने वाले विकास कर भी कैसे सकते हैं? प्रचंड बहुमत से सत्ता में पैठ बनाने वाले नरेन्द्र दामोदर दास मोदी ने कश्मीर के विकास का संकल्प लिया और उसी के तहत महबूबा मुफ्ती को विश्वास में लेकर विधानसभा में पैठ बना ली। भविष्य की संभावनाओं के मद्देनजर अपनी हर उपेक्षा बर्दाश्त की। बावजूद इसके हर मोर्चे पर नाकाम रहे। सिर्फ कश्मीर का मोह उन्हें देश की सत्ता से बाहर कर सकता है ये प्रतीत होते ही राममाधव जैसे चिंतकों ने महबूबा सरकार से समर्थन वापस ले लिया और राष्ट्रपति शासन भी लागू हो गया। पर जब भी आमचुनाव होंगे महागठबंधन की तर्ज पर घाटी की सभी पार्टियां एक हो जायेंगी। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। जम्मू की जनता साथ न दे तो घाटी में एक भी सीट निकाल लेना कम से कम भाजपा के बस की बात नहीं है। अतः कश्मीर को बचाने का एकमात्र मार्ग यही है कि गुलाम कश्मीर को पुनः मुक्त करा लिया जाय। छोटी मोटी सर्जिकल स्ट्राइक से आतंकवाद का सफाया होने वाला नहीं है। केंद्र से लेकर कश्मीर तक सेना को आपरेशन कश्मीर लागू कर गुलाम कश्मीर को फतह कर लेना चाहिये। वर्तमान समय में पाक सेना से पीड़ित नागरिक इस अभियान में हमारे साथ होंगे और पाक प्रायोजित आतंकवाद हमेशा के लिये समाप्त हो जायेगा। इतना ही नहीं भारत में समा चुके घुसपैठियों की कमर भी पूरी तरह टूट जायेगी और तब भारत सरकार कश्मीर में विकास की गंगा बहाकर कश्मीरियों का दिल जीतने में सफल हो सकती है। 
 


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