सीएम व एलजी में तालमेल
| Agency - 07 Jul 2018

देश की सबसे बड़ी अदालत ने केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली और वहां के उपराज्यपाल के बीच चल रहे टकराव को खत्म करते हुए संविधान के अनुसार फैसला कर दिया है। दिल्ली देश की राजधानी है और उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी राज्य के अधीन नहीं की जा सकती। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री के अधिकारों की व्याख्या करते हुए यह भी साफ कर दिया कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होगा। इसके इतर विवाद के जो मामले हैं, उन पर कोर्ट ने उचित व्यवस्था दी है। अभी वहां के सीएम और लेफ्टिनेंट गवर्नर (एलजी) दोनों को तालमेल बनाकर काम  शुरू कर देना चाहिए लेकनि लगता नहीं कि सुप्रीम कोर्ट की मंशा को ये दोनों ही समझ पाये और अभी से अपना-अपना पक्ष उचित ठहराने लगे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जनता की चुनी हुई सरकार के महत्व को सर्वोपरि रखा है लेकिन उपराज्यपाल के अधिकार को भी स्वीकार किया। सुप्रीम कोर्ट का फैसला मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को बड़ी राहत देने वाला है लेकिन उनकी सीमाएं भी कोर्ट ने बतायी हैं। देश मंे  कुछ और भी केन्द्र शासित प्रदेश हैं लेकिन दिल्ली की स्थिति उनमंे सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है और संवेदनशील भी, इसलिए मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को भी पुरानी बातों का गुस्सा थूक देना चाहिए। लगता है कि केजरीवाल बीती बातों को भुला नहीं पाये हैं और उन्होंने उपराज्यपाल अनिल बैजल को पत्र लिखकर अपनी शिकायत भी दर्ज करा दी है। इतना ही नहीं केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रस्तुतिकरण मंे अपने अधिकारों को ही वरीयता दी है और कहा कि अब किसी मामले मंे एलजी की सहमति की जरूरत नहीं है। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने उपराज्यपाल अनिल बैजल को पत्र लिखा है और सामान्य शिष्टाचार के बाद सीधे कहते हैं कि मैं सुप्रीम कोर्ट की ओर से दो खास मुद्दों पर दिये फैसले की तरफ आपका ध्यान आकर्षित कराना चाहता हूं। इन दो फैसलों के बारे मंे केजरीवाल कहते हैं कि अब किसी मामले में एलजी की सहमति की जरूरत नहीं होगी और सर्विसेज से जुड़ी कार्यकारी शक्तियां मंत्रिपरिषद के पास हैं। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने सर्विसेज डिपार्टमेंट की ओर से उनकी सरकार के आर्डर को अस्वीकार करने के बाद उपराज्यपाल को पत्र लिखा है। दिल्ली मंे सरकार और उपराज्यपाल के बीच टकराव पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है लेकिन दिल्ली के सर्विसेज विभाग के अफसर अब भी उसी तरह के काम करना चाहते हैं, जैसे पहले कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद डिप्टी सीएम मनीष सिसौदिया की अनुमति के बिना कोई ट्रांसफर या नियुक्ति नहीं की जाएगी। सर्विसेज डिपार्टमेंट ने भी कानून सम्मत राह पकड़ ली है। वहां से एक नोटिस भेजकर कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक होम मिनिस्ट्री के मई 2015 के नोटीफिकेशन को रद्द नहीं किया है, जिसमे ब्यूरोक्रेट्स (नौकरशाहों) के ट्रांसफर और नियुक्ति की जिम्मेदारी उपराज्यपाल को दी गयी थी। इस नोटीफिकेशन को रद्द करने के लिए उपराज्यपाल ही सर्विसेज डिपार्टमेंट के प्रभारी हैं।
इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने फैसला तो कर दिया लेकिन कुछ पेंच अभी फंसे हैं और उनका फायदा उपराज्यपाल उठा रहे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने उपराज्यपाल को ही सर्वेसर्वा बताकर केन्द्रीय गृहमंत्रालय के अधीन ये सभी कार्य कर दिये थे। अब दिल्लीके डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया उपराज्यपाल से इस मामले मंे कुछ न कहकर सर्विसेज डिपार्टमेंट से कह रहे हैं कि उनके (सरकार के) आदेश का पालन किया जाए अथवा अदालत की अवमानना का सामना करने को तैयार हो जाएं।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने कैबिनेट की बैठक बुलाकर मुख्य सचिव को तमाम निर्देश जारी कर दिये। सरकार ने फैसला लिया था कि आईएएस और अन्य महत्वपूर्ण अफसरों के तबादले व नियुक्ति सरकार करेगी। सर्विसेज विभाग के मंत्री मनीष सिसोदिया हैं और डिपार्टमेंट ने इसीलिए उनका आदेश मानने से इंकार कर दिया क्योंकि पुराना नोटीफिकेशन अभी निरस्त नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं लेकिन उपराज्यपाल स्वतंत्र रूप से फैसले नहीं ले सकेंगे। कोर्ट ने कहा कि उपराज्यपाल नहीं बल्कि दिल्ली की सरकार ही सुप्रीम है लेकिन मुख्यमंत्री केजरीवाल को भी परोक्ष रूप से नसीहत दी गयी है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले मंे यह कहकर दिल्ली के मुख्यमंत्री को आईना दिखाया है कि लोकतंत्र मंे अराजकता के लिए कोई जगह नहीं है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि सत्ता पर काबिज अधिकारियों को सदैव यह ध्यान रखना चाहिए कि वे संवैधानिक पदों पर हैं और प्रशासन का मुख्य उद्देश्य नैतिक तरीके से लोगों का कल्याण करना है।
इसी तरह दिल्ली के उपराज्यपाल को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट सीमा रेखा तय की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपराज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य है अथवा उस पर राष्ट्रपति कोई निर्णय देते हैं तो उपराज्यपाल उसे मानेगा लेकिन स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार उपराज्यपाल को नहीं है। इसी सिलसिले मंे सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली का दर्जा अलग है और दिल्ली के उपराज्यपाल व अन्य राज्यों के राज्यपालों मंे काफी अंतर है। दिल्ली के उपराज्यपाल को मंत्रिपरिषद के साथ सौहार्दपूर्ण तरीके से काम करना चाहिए। इस बात पर तो लगभग सभी न्यायाधीश सहमत थे कि उपराज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह मानने को बाध्य है। जस्टिस अशोक भूषण ने संविधान के अनुच्छेद 239 एए(4) का हवाला देेते हुए कहा कि अपवादों को छोड़ दिल्ली के उपराज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह मानने को बाध्य है। उन्होंने कहा कि उपराज्यपाल को अनुच्छेद 239 एए(4) का इस्तेमाल रूटीन तरीके से नहीं करना चाहिए, सोच-समझकर और तार्किक तरीके से नहीं करना चाहिए, सोच-समझकर और तार्किक आधार पर उपराज्यपाल को इस अधिकार का इस्तेमाल करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट क्या कहना चाहता है, यह दिल्ली के उपराज्यपाल की समझ मंे आ गया है लेकिन केन्द्र मंे विरोधी पक्ष की सरकार के चलते उपराज्यपाल को इसी अधिकार का प्रयोग बार-बार करना पड़ता है, सरकार के फैसले रोक कर राष्ट्रपति के पास भेजने पड़ते हैं। यही विवाद की मुख्य वजह है। कानून की ढिलाई तो महज एक बहाना बन जाता है। 
 


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