दलदल की तरफ खुद बढ़ रहे राहुल
| Agency - 11 Jul 2018

कांग्रेस को 2019 के चुनाव में मुसलमान वोट बैंक को अपने साथ लाने की चिंता तो है लेकिन इस बात से डर भी लग रहा है कि राहुल गांधी का ‘जनेऊ’ फिर से अंदर न चला जाए। गुजरात और कर्नाटक के चुनाव में कांगे्रस और राहुल गांधी ने बड़ी मुश्किल से अपनी हिन्दू विरोधी छवि को सही करने में सफलता प्राप्त की है। मुसलमान कभी कांग्रेस के प्रमुख वोट बैंक हुआ करते थे लेकिन अब वे कांग्रेस के पाले से खिसक कर अलग-अलग पार्टियों में चले गये हैं।भारत की राजनीति हिचकोले खा रही है। यह 2019 के लोकसभा चुनाव का भूकम्प ही है, जिसके झटके लग रहे हैं। कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी को 2014 से लेकर 2017 तक बहुत सदमे झेलने पड़े लेकिन गुजरात विधानसभा चुनाव में राहुल को संभलने का मौका मिला। वहां भले ही कांग्रेस सरकार बनाने में सफल नहीं हो सकी लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस को जनता दल(एस) के साथ भाजपा के जबड़े से सत्ता खींचने में सफलता मिल गयी तो राहुल गांधी दिशाहीन नजर आने लगे। उन्हें विपक्षी एकता के गठबंधन पर चिंतन करना था लेकिन वह कहने लगे कि मौका मिला तो मैं प्रधानमंत्री बनूंगा। इस पर गठबंधन के नेता ही चैंकने लगे। सपा के प्रमुख अखिलेश यादव, बसपा प्रमुख सुश्री मायावती, तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी और माकपा के सीताराम येचुरी भी राहुल गांधी के बयान को समय पूर्व बयान बताने लगे थे। इन सबके बीच गुजरात और कर्नाटक का उदाहरण इसलिए दिया कि यहां चुनाव के समय राहुल का जनेऊ ज्यादा दिखाया गया था। अब वही राहुल गांधी मुस्लिम बुद्धिजीवियों के साथ चुनावी मंथन कर रहे हैं। इससे यही लगता है कि राहुल गांधी स्वयं ही राजनीति के दलदली रास्ते पर बढ़ रहे हैं। जाति एवं साम्प्रदायिकता की राजनीति कभी भी किसी राष्ट्रीय स्तर की पार्टी को लाभ नहीं पहुंचा पायी है, क्षेत्रीय दल ही इसका फायदा उठाते रहे हैं। यह बात कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनके सलाहकारों को समझनी पड़ेगी। अभी तो यही कहा जा रहा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए देश भर के बुद्धिजीवियों से राहुल गांधी चुनावी मंथन कर रहे हैं। यह योजना अथवा अभियान भाजपा के जनसम्पर्क एवं समर्थन अभियान की तुलना मंे कहीं ठहर ही नहीं पाता है। भाजपा के वरिष्ठ से लेकर कनिष्ठ नेता तक समाज के प्रतिष्ठित लोगों से मिलते हैं और मोदी सरकार की चार साल की उपलब्धियां भेंट करते हैं। पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल सुहाग से यह कार्यक्रम अमित शाह ने शुरू किया था। भाजपा के नेता उन लोगों से भी इस संदर्भ में मुलाकात कर रहे हैं जो उसकी आलोचना करते हैं। मसलन पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने मुंबई में कई प्रख्यात लोगों से मुलाकात करते हुए शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से भी मुलाकात की। उद्धव के साथ बंद कमरे में बात भी की इस प्रकार भाजपा का सम्पर्क हो रहा है, संवाद भी स्थापित हो रहे हैं। उधर, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मिलकर चुनावी मंथन कर रहे हैं।
कांग्रेस के नेताओं से छनकर आयी खबरों के अनुसार करीब 30 मुस्लिम ओपीनियन मेकर्स से राहुल गांधी की मुलाकात करायी जाएगी। राहुल 2019 के चुनाव मंे मुसलमान ओपीनियन मेकर्स की राय जानना चाहते हैं। राहुल के साथ मुलाकात  मंे ट्रिपल तलाक, हलाला और कश्मीर को लेकर विशेष रूप से चर्चा होगी। कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद और कांग्रेस अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष नदीम जावेद इसकी तैयारी करवा रहे हैं। इसके बारे में कांग्रेस के नेता खुलकर कहने को तैयार नहीं हैं और जब तब यह संकेत भी दे देते हैं। दरअसल कांग्रेस को 2019 के चुनाव में मुसलमान वोट बैंक को अपने साथ लाने की चिंता तो है लेकिन इस बात से डर भी लग रहा है कि राहुल गांधी का ‘जनेऊ’ फिर से अंदर न चला जाए। गुजरात और कर्नाटक के चुनाव में कांगे्रस और राहुल गांधी ने बड़ी मुश्किल से अपनी हिन्दू विरोधी छवि को सही करने में सफलता प्राप्त की है। मुसलमान कभी कांग्रेस के प्रमुख वोट बैंक हुआ करते थे लेकिन अब वे कांग्रेस के पाले से खिसक कर अलग-अलग पार्टियों में चले गये हैं। इस प्रकार कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का मुस्लिम बद्धिजीवियों से गुपचुप सम्पर्क कांग्रेस के लिए ही मुसीबत बनता जा रहा है। भाजपा ने तो अभी से कहना शुरू कर दिया कि राहुल का जनेऊ अब कहां चला गया है। विपक्षी दलों एकता की बात पर भी राहुल गांधी का बचपना भारी पड़ जाता है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की नेता सुश्री ममता बनर्जी ने गत दिनों कहा भी है कि केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को बाहर करने के लिए कांग्रेस के साथ मिलकर काम करना होगा लेकिन राहुल गांधी के बारे में उन्होंने कहा कि वह काफी जूनियर हैं। ममता बनर्जी कहती हैं कि उन्हें किसी के साथ भी काम करने में तब तक कोई समस्या नहीं है, जब तक उनकी मंशा और दर्शन (विचार) साफ हो। कांग्रेस के साथ संबंधों के बारे में सुश्री ममता बनर्जी ने कहा था कि मैं राजीव जी या सोनिया जी के बारे में जो कुछ कह सकती हूं, वही राहुल के बारे में नहीं कह सकती, क्योंकि वह काफी जूनियर हैं। ममता बनर्जी ने यह बात खुलकर कही है कि कुछ विपक्षी पार्टियां कांग्रेस को छोड़कर संघीय मोर्चा बनाना चाहती हैं क्योंकि उनकी ़क्षेत्रीय मजबूरी है। सुश्री ममता बनर्जी कहती हैं कि यह बात कांग्रेस को भी समझनी चाहिए। अगर कांग्रेस मजबूत है और कुछ स्थानों पर अधिक सीटें पाती है तो उसे अगुवाई करने दें। ़क्षेत्रीय दल अगर किसी और जगह एक साथ हैं तो वे इस मामले में निर्णायक की भूमिका निभा सकते हैं। दरअसल, सुश्री ममता बनर्जी के इस बयान से पूर्व ही राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल कांग्रेस के नेताओं से बातचीत की थी। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के नेता सुश्री ममता बनर्जी के साथ रहना चाहते हैं जबकि मौजूदा हालात में कांग्रेस ने वामपंथियों के साथ गठजोड़ कर रखा है। पश्चिम बंगाल मंे ही लोकसभा की कुल 42 सीटें हैं। वहां के प्रदेश कांग्रेस प्रमुख अधीर रंजन चैधरी कांग्रेस के साथ गठबंधन के पक्ष में नहीं हैं। 
इस प्रकार पश्चिम बंगाल में ही गठबंधन बनने से पहले ही बिखरता दिख रहा है। बेंगलुरु में एचडी कुमार स्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में सुश्री ममता बनर्जी जिस तरह से उत्साह दिखा रही थीं, वह अब नहीं दिखाई पड़ रहा है। पश्चिम बंगाल ही क्यों, उस कर्नाटक में भी कांग्रेस और जेडीएस के बीच तकरार की खबरें आने लगी हैं जहां विपक्षी एकता का बिगुल फूंका गया था। राहुल गांधी के व्यवहार से ऐसा नहीं लगता है कि वह विपक्षी एकता के प्रति ज्यादा गंभीर हैं। इसीलिए मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के लिए भी वह तालमेल करने में उत्सुकता नहीं दिखा रहे हैं। मध्य प्रदेश में सुश्री मायावती और अखिलेश यादव कांग्रेस की मदद भले ही न कर पायें लेकिन नुकसान जरूर कर सकते हैं। इन सब बातों से बेखबर राहुल गांधी एक ऐसे वोट बैंक के पीछे भाग रहे हैं जो अब किसी का भी विश्वसनीय नहीं रह गया है और कांग्रेस का मंदिर मठों में जाना जिनको अच्छा लगने लगा था, वे भी अब शंका भरी निगाह से उन्हें देखने लगे है। राहुल के शुभचिंतक उन्हें अब भी उस दलदल भरे रास्ते पर जाने से रोक सकते हैं। 
 


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