जगन्नाथ जी की महिमा
| Agency - 11 Jul 2018

ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ का पवित्र धाम है, जिसे पुराणों में धरती का बैकुण्ठ कहा गया है। यह धाम हिंदू धर्म के चार धाम में से एक है। इसे नीलांचल धाम भी कहा जाता है। यहां विराजमान भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। मंदिर 1200 साल पुराना है।
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा का शुभारंभ होता है। कहते है भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा को जिसने हाथ लगा दिया, उसे जीवन- मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। ब्रह्म और स्कंद पुराण के अनुसार, पुरी में भगवान विष्णु ने पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतार लिया था। वह यहां सबर जनजाति के परम पूज्य देवता बन गए। सबर जनजाति के देवता होने की वजह से यहां भगवान जगन्नाथ का रूप कबीलाई देवताओं की तरह है। जगन्नाथ मंदिर की महिमा देश में ही नहीं विश्व में भी प्रसिद्ध हैं। भगवान जगन्नाथ को साल में एक बार उनके गर्भ गृह से निकालकर यात्रा कराई जाती है। यात्रा के पीछे यह मान्यता है कि भगवान अपने गर्भ गृह से निकलकर प्रजा के सुख-दुख को खुद देखते हैं। द्वापर में श्रीकृष्ण की लीला के बाद कलियुग में मुख्य देवता के रूप में श्री जगन्नाथ यानी श्री हरि विष्णु ही मान्य है। मान्यता है कि महाभारत के बाद कौरवों की माता गांधारी ने श्रीकृष्ण को श्राप दिया था कि कौरव वंश की तरह यदुवंश का नाश होगा।
श्राप के चलते ही यदुवंश के लोग भी लड़-लड़ कर नष्ट हो गए। श्रीकृष्ण अकेले बच गए और श्रापवश ही बहेलिए का तीर लगने पर उनकी मृत्यु हुई। शास्त्रों में वर्णन है कि आषाढ़ माह में जरा के आघात से श्रीकृष्ण ने देह त्यागी थी। श्रीकृष्ण के इहलीला संवरण के बाद सखा अर्जुन ने उनकी अंत्येष्टि क्रिया के लिए शरीर में अग्नि संयोग किया पर श्रीकृष्ण पूरी तरह भस्मीभूत नहीं हुए। आकाशवाणी के निर्देशानुसार अदग्ध नाभिमंडल को अर्जुन ने सागर में प्रवाहित कर दिया। यह अदग्ध नाभिमंडल पश्चिमी सागर से तैरते-तैरते पूर्वी उपकूल में लगा। पुरी के तत्कालीन राजा को स्वप्नादेश हुआ कि इस पवित्र दारु को सम्मान सहित स्वीकार कर विष्णु की मूर्ति की पूजा-अर्चना करो। महाराज ने तैर कर आए दारु से विग्रहों का निर्माण किया और मंदिर में जगन्नाथ के रूप में स्थापित किया, जहां आज भव्य मंदिर है। जगन्नाथ मंदिर की खासियत यह है कि शिखर पर स्थित झंडा हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है। इसी तरह मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र भी है। इस चक्र को किसी भी दिशा से खड़े होकर देखने पर ऐसा लगता है कि चक्र का मुंह आपकी तरफ है। मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं। यह प्रसाद मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी पर ही पकाया जाता है। इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है फिर नीचे की तरफ से एक के बाद एक प्रसाद पकता जाता है। मंदिर के द्वार से पहला कदम अंदर रखने पर ही आप समुद्र की लहरों से आने वाली आवाज को नहीं सुन सकते है। आश्चर्य में डाल देने वाली बात यह है कि जैसे ही आप मंदिर से एक कदम बाहर रखेंगे, वैसे ही समुद्र की आवाज सुनाई देने लगती है। यह अनुभव शाम के समय और भी अलौकिक लगता है। हमने ज्यादातर मंदिरों के शिखर पर पक्षी बैठे और उड़ते देखे हैं। जगन्नाथ मंदिर की यह बात आपको चैंका देगी कि इसके ऊपर से कोई पक्षी नहीं गुजरता। यहां तक कि हवाई जहाज भी मंदिर के ऊपर से नहीं निकलता। मंदिर में हर दिन बनने वाला प्रसाद भक्तों के लिए कभी कम नहीं पड़ता साथ ही मंदिर के पट बंद होते ही प्रसाद भी खत्म हो जाता है।
दिन के किसी भी समय जगन्नाथ मंदिर के मुख्य शिखर की परछाई नहीं बनती। एक पुजारी मंदिर के 45 मंजिला शिखर पर स्थित झंडे को रोज बदलता है। ऐसी मान्यता है कि अगर एक दिन भी झंडा नहीं बदला गया तो मंदिर 18 वर्षों के लिए बंद हो जाएगा। आमतौर पर दिन में चलने वाली हवा समुद्र से धरती की तरफ चलती और शाम को धरती से समुद्र की तरफ। चकित कर देने वाली बात यह है कि पुरी में यह प्रक्रिया उल्टी है। मंदिर में योगेश्वर श्रीकृष्ण जगन्नाथ के रूप में विराजते हैं। साथ ही यहां बलभद्र एवं सुभद्रा भी हैं। श्रीकृष्ण साक्षात भगवान विष्णु के अवतार हैं। अपने भक्तों को सन्देश देते हुए उन्होंने स्वयं कहा है-जहां सभी लोग मेरे नाम से प्रेरित हो एकत्रित होते हैं, मैं वहां पर विद्यमान होता हूं।
यह भारत के ओडिशा राज्य के तटवर्ती शहर पुरी में स्थित है। जगन्नाथ शब्द का अर्थ जगत के स्वामी होता है। इनकी नगरी ही जगन्नाथपुरी या पुरी कहलाती है। पुरी में कुल 168 मठ है। यहां भारतीय संस्कृति का मूलमंत्र सिखाया जाता है। ये हजारों सालों से विश्व मैत्री के प्रतीक है, जो गुरुग्रंथ साहिब में वर्णित है। आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष के द्वितीया को यहां भव्य रथयात्रा मेले का आयोजन होता है। मेले में भारत ही नहीं बल्कि सात समुंदर पार से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटते है।
इस दिन रथ पर आरूढ़ होकर भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र के साथ गुंडिचा मंदिर जाते है। वहां वे दस दिन तक रहते है। इन दस दिनों में उनका रूप दशावतार के भिन्न-भिन्न् रूप में प्रतिदिन बदला आते है। दस दिन वहां रहने के पश्चात 11वें दिन एकादशी को पुनः रथ पर आरूढ़ होकर मंदिर वापस जाता है। इन दस दिनों में पुरी दूधिया रोशनी में नहाए दुल्हन की तरह सजी होती है। चारों तरफ शंख, घंटे-घड़ियाल व तरह-तरह के वाद्य यंत्रों के बीच पूजन-अर्चन होता रहता है। दशावतार दर्शन के लिए लोग पहुंचकर इस महापर्व को मनाते है। भगवान जगन्नाथ जी की मूर्ति को उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की छोटी मूर्तियों के साथ रथ में ले जाया जाता है और धूम-धाम से इस रथ यात्रा का आरंभ होता है। सागर तट पर बसे पुरी शहर में आयोजित होने वाली यह रथयात्रा उत्सव पूरे भारत में विख्यात है। उत्सव के समय आस्था का जो विराट वैभव देखने को मिलता है, वह बहुत दुर्लभ है। भगवान जगन्नाथ मंदिर से तीनों देवताओं के सजाये गये रथ खींचते हुए दो किमी की दूरी पर स्थित गुंडिचा मंदिर तक ले जाते हैं और नवें दिन इन्हें वापस लाया जाता है।
इस अवसर पर सुभद्रा, बलराम और भगवान श्रीकृष्ण का पूजन नौ दिनों तक किया जाता है। इन नौ दिनों में भगवान जगन्नाथ का गुणगान किया जाता है। भगवान कृष्ण के अवतार जगन्नाथ की रथयात्रा का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर माना जाता है। 
 


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