उपराज्यपाल किरण बेदी से भी टकराव
| Agency - 17 Jul 2018

संवैधानिक संस्थाओं में मतभेद तो हो सकते हैं लेकिन उनके मन में ही भेद है तो राजकाज चलना मुश्किल हो जाता है। दिल्ली के मुख्यमंत्री बनते ही अरविन्द केजरीवाल और वहां के तत्कालीन उपराज्यपाल नजीब जंग के बीच जंग शुरू हो गयी थी।  इसी जंग के दौरान ही अरविन्द केजरीवाल ने अपनी सरकार का इस्तीफा दे दिया दिल्ली में दो साल के अंदर ही विधानसभा के चुनाव फिर से हुए और इस बार दिल्ली की जनता ने केजरीवाल को प्रचण्ड बहुमत देकर सरकार बनवाई लेकिन उपराज्यपाल और सरकार के बीच पटरी नहीं बैठ सकी। नजीब जंग ने लेफ्टिनेंट गवर्नर की कुर्सी छोड़ी, उनकी जगह पूर्व डीजीपी अनिल बैजल ने गद्दी संभाली फिर भी तनातनी उसी तरह चलती रही। मामला हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गया। हाईकोर्ट ने उपराज्यपाल के पक्ष में ही फैसला सुनाया था लेकिन देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा कि जनता ने जिस सरकार को चुना है, वही सुप्रीम है और राज्यपाल को कुछ मामलों को छोड़कर सरकार की सलाह माननी ही पड़ेगी। कुछ मामलों के बारे में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपराज्यपाल को अगर लगता है कि दिल्ली सरकार यह नियम ठीक से नहीं बना रही अथवा किसी की तैनाती गलत तरीके से करा दी है तो उसे उस मामले को राष्ट्रपति के पास भेजने का अधिकार है, राज्यपाल स्वयं कोई फैसला नहीं करेगा। अब एक अन्य केन्द्र शासित प्रदेश पांडिचेरी को लेकर भी सरकार और उपराज्यपाल किरण वेदी के बीच विवाद सामने आया है। पूर्व पुलिस अधिकारी श्रीमती किरण वेदी अन्ना के आंदोलन से भी जुड़ी रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में किरण वेदी को मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बनाया गया था लेकिन श्रीमती किरण वेदी और भाजपा दोनों धराशायी हो गयीं। श्रीमती किरण वेदी तो कई दिनों तक पर्दे के पीछे रहीं, फिर अचानक उनका नाम सामने तब आया जब उन्हें केन्द्र शासित प्रदेश पांडिचेरी का उपराज्यपाल बनाया गया। पांडिचेरी मंे कांग्रेस ने सरकार बनायी है और यहां के राजनीतिक हालात भी दिल्ली की तरह ही हैं। केन्द्र और राज्य की सरकार अलग-अलग दल की होने पर इस तरह की स्थितियां पैदा हो जाती हैं। प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी इस मामले मंे अपवाद जरूर कहे जाएंगे क्योंकि उनके प्रधानमंत्री रहते दिल्ली मंे कांग्रेस की श्रीमती शीला दीक्षित सरकार चलाती रहीं और कोई विवाद नहीं पैदा हुआ। यह आदर्श स्थिति है लेकिन राजनीति मंे अब आदर्श की कल्पना करना ही व्यर्थ है। इसलिए पांडिचेरी में जो हो रहा है, उसके लिए किसी एक पक्ष को ही दोषी करार नहीं दिया जा सकता। पांडिचेरी विधानसभा के बाहर बहुत ही जोरदार हंगामा हो रहा है। अरविन्दो घोष के आश्रम वाला यह केन्द्र शासित प्रदेश स्वार्थ की सियासत में उलझ गया है।
पांडिचेरी की उपराज्यपाल और गृहमंत्री की ओर से मनोनीत तीन भाजपा विधायक विधानसभा के बाहर प्रदर्शन करने को मजबूर हो गये। केन्द्र शासित प्रदेश का शासन केन्द्रीय गृहमंत्रालय के निर्देश पर उपराज्यपाल चलाते हैं। पांडिचेरी की संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार उपराज्यपाल किरण वेदी और केन्द्रीय गृहमंत्रालय की तरफ से भाजपा के तीन विधायकों का मनोनयन किया गया। मनोनीत विधायकों मंे बी. स्वामीनाथन, केजी शंकर और एस सेल्वा गणपति शामिल हैं। इन तीनों विधायकों के मनोनयन पर कांग्रेस पार्टी लगातार आपत्ति दर्ज कराती रही है। विधानसभा में कांगे्रस को बहुमत प्राप्त है और वी. नारायण सामी वहां के मुख्यमंत्री हैं। इन तीनों विधायकों का मामला भी हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है। विधानसभाध्यक्ष वैद्यालिंगम का कहना है कि तीनों विधायकों का मनोनयन गलत तरीके से हुआ है और उन्हें सदन में बैठने का हक नहीं है। इसीलिए विधानसभा स्पीकर वैद्यालिंगम ने इन तीनों विधायकों को विधानसभा भवन में घुसने की इजाजत नहीं दी। कथित मनोनीत विधायकों ने विरोध स्वरूप विधानभवन के बाहर प्रदर्शन किया। 
वी. स्वामीनाथन, केजी शंकर और एस सेल्वा गणपति का भाजपा विधायक के रूप में मनोनयन उपराज्यपाल किरण वेदी ने 2017 में ही किया था। कांग्रेस के नेताओं और मुख्यमंत्री वी. नारायण सामी ने इन तीनों विधायकों के मनोनयन पर सवाल उठाया इसके बाद ही मामला कोर्ट में पहुंचा। मद्रास उच्च न्यायालय ने तीनों विधायकों के नामांकन को वैध करार दिया था। इसके बाद प्रदेश में सत्तारूढ़ दल कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामला सुप्रीम कोर्ट में  लम्बित है, इसलिए विधानसभाध्यक्ष वैद्यालिंगम ने मार्च महीने में बजट सत्र के दौरान भी तीनों विधायकों को सदन में प्रवेश नहीं करने दिया था। उस समय भी सदन में खूब हंगामा हुआ था। अब वर्षाकालीन सत्र में भी स्पीकर ने मनोनीत विधायकों को सदन में प्रवेश नहीं करने दिया तो विधायकों ने सदन के बाहर प्रदर्शन किया। गांधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन में जोरदार भाषण करने वाली भारत की पहली महिला आईपीएस किरण वेदी को जब भाजपा ने पांडिचेरी का उपराज्यपाल बनाया था, तभी यह आशंका जतायी गयी थी कि अब मुख्यमंत्री बी. नारायण सामी की दिक्कतें बढ़ सकती हैं। श्रीमती किरण वेदी को 22 मई 2018 में फ्रांस ने जब दूसरी बार वल्र्डकप का खिताब जीता था, तब श्रीमती किरण वेदी ने वेबसाइट ट्विटर पर लिखा- हम पुड्डिचेरियनों (पूर्व फ्रांसीसी क्षेत्र) ने वल्र्ड कप जीत लिया। पत्रकार शेखर गुप्ता ने तब ट्विटर पर ही किरण वेदी को जवाब दिया था- छोटा सा सुधार करना होगा मैडम, पुड्डुचेरी कभी फ्रांसीसी क्षेत्र नहीं रहा, वह हमेशा भारतीय क्षेत्र रहा है। इस प्रकार श्रीमती किरण वेदी कब, क्या कह दें यह किसी को नहीं मालूम। पांडिचेरी के मुख्यमंत्री बी. नारायण सामी से भी उनके मतभेद सामने आते रहे हैं। अभी गत 6 जुलाई को ही सुप्रीम कोर्ट ने जब कहा कि पुड्डुचेरी की तुलना दिल्ली से नहीं की जा सकती क्योंकि पुड्डुचेरी के शासन का प्रावधान राष्ट्रीय राजधानी से संबंधित प्रावधान से अलग है। शीर्ष अदालत ने कहा था कि पुड्डुचेरी का मामला केन्द्र शासित प्रदेशों अंडमान निकोबार द्वीप समूह, दमन और दीव, दादर नागर हवेली लक्षदीप और चण्डीगढ़ से भी अलग है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा था कि पुड्डुचेरी का शासन संविधान के अनुच्छेद 239-ए के अनुसार चलता है जबकि दिल्ली के शासन के लिए अनुच्छेद 239 एए उपलब्ध है।
दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट का जब फैसला आया था, तब बी नारायाण सामी को उम्मीद बंधी थी कि उपराज्यपाल किरण वेदी और उनके बीच जो तनाव भरा वातावरण है, वह समाप्त हो जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हो पाया है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने चेतावनी दी है कि अगर उपराज्यपाल ने उच्चतम न्यायालय के फैसले के अनुसार काम नहीं करंेगी तो वह अवमानना की याचिका दायर करेंगे। यहां पर ध्यान रखना होगा कि लगभग एक साल पहले 21 जुलाई 2017 को इस तरह के पोस्टर लगाये गये थे जिनमंे किरण वेदी को हिटलर दिखाया गया था। श्रीमती किरण वेदी ने कहा था कि वह एक रबड़ स्टाम्प नहीं हैं और एक प्रशासक के रूप मंे अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें, रबड़ स्टैम्प न बनकर विवेकपूर्ण फैसले करें लेकिन विधानसभा की गरिमा भी कायम रहे। विधायक विधान भवन के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं तो इसे गरिमापूर्ण स्थिति नहीं कहा जा सकता। 
 


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