ईवीएम पर मोर्चेबंदी का औचित्य
| Agency - 04 Aug 2018

प्रजातंत्र में चुनाव बहुत महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। जनता अपने लिए ही सरकार बनाती है जिसमें एक सीमित संख्या में प्रतिनिधि चुनने पड़ते हैं। बाद का सारा खेल यही प्रतिनिधि करते हैं। इन जन प्रतिनिधियों के बारे में लोकतंत्र के संस्थापकों ने जो कल्पना की थी, वह अब पूरी तरह बदल गयी है और बड़ी से बड़ी नौकरियां छोड़कर भी लोग जन प्रतिनिधि बनने को तैयार हो जाते हैं। गांव के स्तर पर ग्राम प्रधान से लेकर सांसद तक जो जन प्रतिनिधि हैं, उन्होंने अपने को ही नहीं आने वाली कई पीढ़ियों तक को तारने के लिए विकास की गंगा अपनी चैखट के पास से बहा दी है। इसलिए जन प्रतिनिधियों का चुनाव भी बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। चुनाव में निष्पक्षता, निर्भीकता और पारदर्शिता होनी चाहिए। शत-प्रतिशत मतदान में भागीदारी छोटे स्तर के चुनाव में संभव है लेकिन करोड़ों लोगों के बीच जब चुनाव होता है तो यह संभव नहीं है। इसीलिए चुनाव के लिए इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का प्रचलन शुरू हुआ जिससे मतगणना में विशेष रूप से मदद मिलती है लेकिन कुछ राजनीतिक दलों को ईवीएम मशीनों पर संदेह है और उन्होंने कहा है कि 2019 के आम चुनाव मत पत्रों के माध्यम से कराए जाएं। चुनाव आयोग इस पर तैयार नहीं है। इसके साथ ही सत्तारूढ़ भाजपा और उसके सहयोगी दल भी नहीं चाहते कि ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाएं। इसका कितना औचित्य है, यह देखना पड़ेगा।
विपक्षी दलों ने यह मामला 2014 में उठाया। हालांकि उससे भी पूर्व भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी ईवीएम पर सवाल उठाया था। यह बात 2004 की है जब पहली बार यूपीए की सरकार बनी थी। इसके बाद 2014 में भाजपा ने श्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर लहर में विपक्षी दलों को पूरी तरह धराशायी कर दिया। उस समय विपक्षी दलों ने कहना शुरू किया कि ईवीएम में कुछ खेल किया गया है। इसके बाद इन मशीनों के पक्ष और विपक्ष मंे जब तब बहसें होती रहती हैं। अभी ताजा बहस में ईवीएम के खिलाफ 17 राजनीतिक दल एक मंच पर आ गये हैं और कह रहे कि अगला चुनाव मतपत्रों से होना चाहिए। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत ने 2 जून 2018 को कहा था कि ईवीएम को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा था कि राजनीतिक दलों को जब चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ता है तब किसी न किसी को जिम्मेदार ठहराने की जरूरत होती है लेकिन इन राजनीतिक दलों को यह समझ लेना चाहिए कि बैलेट पेपर इतिहास बन चुके हैं और इन्हें वापस लाने की कोई संभावना नहीं है। दूसरी तरफ चुनाव आयोग में अर्से तक काम कर चुके पूर्व कानूनी सलाहकार एसके मेदीरत्ता ने कहा है कि चुनाव आयोग भले ही समय पर नयी ईवीएम और वीवीपैट को ले आने की बात कर रहा हो लेकिन जिन दो कंपनियों को ये मशीने बनाने का ठेका दिया गया है, वे सुस्त रही हैं। इन दोनों कंपनियों ने समय पर कभी भी डिलीवरी नहीं दी है। श्री मेंदीरत्ता की बात महत्वपूर्ण इसलिए है कि 2019 के आम चुनाव में पर्याप्त वीवीपैट मिल सकेंगी अथवा नहीं और तब समय से पहले आम चुनाव की कोई संभावना नहीं दिख रही है। इसी वर्ष मई में चार लोकसभा सीटों और 10 विधानसभा सीटों पर उप चुनाव हुए थे, इस दौरान बड़ी संख्या में वीवी पैट मशीनों में खराबी की शिकायतें भी मिली थीं।
इस प्रकार ईवीएम पर विपक्षी दलों को दो-दो हाथ करने का मौका भी मिल गया है लेकिन राष्ट्रीय हित में ईवीएम का प्रयोग ही हितकर दिख रहा है। इसके साथ ही ईवीएम पर अविश्वास के बादल भी छंटने चाहिए। भारत में ईवीएम का प्रयोग पहली बार 1998 में हुआ है। प्रयोग के तौर पर 16 विधानसभा क्षेत्रों में ईवीएम से मतदान कराया गया था। ईवीएम से जहां मतदान हुआ था उनमें मध्य प्रदेश की पांच, राजस्थान की पांच और दिल्ली की 6 विधानसभा सीटें शामिल की गयी थीं। इन मशीनों में अधिकतम 64 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला किया जा सकता था और 3840 वोट डाले जा सकते थे। अब इन्हें काफी परिष्कृत किया जा चुका है तथा वीवी पैट को साथ में जोड़ दिया गया है जिससे मतदाताओं को यह पता उसी समय चल जाता है जब वह वोट डालता है ईवीएम से पहले मतपत्रों का प्रयोग किया जाता था और बड़ी-बड़ी मतदान पेटियां बनायी जाती थीं। उस समय चुनाव में धांधली की संभावनाएं अधिक रहती थीं। सबसे बड़ी आशंका बूथ कैप्चरिंग की होती थी क्योंकि तब कोई भी ताकत के बल पर मत पत्र लेकर उन पर अपनी पसंद के उम्मीदवार के पक्ष में ठप्पा लगा देता था। हालांकि यह आशंका आज भी है लेकिन ईवीएम का संचालन करने वाला यदि मशीन को आन नहीं करता तब तक कोई भी एक से अधिक वोट नहीं डाल सकता। इसके अलावा वैलेट पेपर चोरी करके भी फर्जी मतदान कराया जाता था। एक समस्या मत निरस्त होने की रहती थी। मतदाता ने जरा भी गलती निशान लगाने में कर दी तो यह माना जाता था कि मत निरस्त है दो चुनाव चिन्ह के बीच में ठप्पा लगने से मत निरस्त हो जाता था। इस प्रकार लोग अपने मताधिकार का सही प्रयोग नहीं कर पाते थे। मत पत्रों की संख्या इतनी ज्यादा होती थी कि उनकी गणना करने में बहुत समय लग जाता था। मतपेटियों को लाने-ले जाने में भी परेशानी होती थी। इन सभी समस्याओं से ईवीएम ने मुक्ति दिला दी है। यह बात विपक्षी दलों को समझनी चाहिए।
मोटे रूप से तो यही लगता है कि भाजपा ने जिस प्रकार से पूरे देश में भगवा रंग फैलाया है, उससे छोटे-बड़े कई राजनीतिक दल सहमे हुए हैं और कोई न कोई मुद्दा उठाना चाहते हैं। ईवीएम का मामला हालांकि काफी पहले से चल रहा है लेकिन 2019 के लिए इसे प्रमुख मुद्दा बनाकर विपक्षी एकता का प्रयास किया जा रहा है। ईवीएम की बजाय वैलेट पेपर से चुनाव कराने के लिए 17 राजनीतिक दल एक साथ खड़े हैं। इन राजनीतिक दलों में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, सपा, बसपा, आम आदमी पार्टी, वाईएसआर कांग्रेस द्रमुक, जेडीएस, टीडीपी, भाकपा और माकपा के साथ आरजेडी और शिवसेना भी शामिल है। महाराष्ट्र में शिवसेना से अलग होने वाली महाराष्ट्र नव निर्माण सेना ने भी ईवीएम की आलोचना की है। मनसे प्रमुख राजठाकरे कहते हैं कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ करके ही भाजपा पिछले चुनावों में जीतकर आयी है। ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायत पहले यदा-कदा ही उठती थी लेकिन 2017 में जब पांच राज्यों के साथ उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए और बसपा को बहुत कम विधायक मिल पाये तो सुश्री मायावती ने ईवीएम को निशाने पर लिया था। इसके बाद अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया था। दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने विधानसभा में बाकायदा डेमो के जरिए यह दावा किया था कि ईवीएम को आसानी से टैंपर किया जा सकता है। इस पर मीडिया ने भी आप को घेरे में लिया था और फिर चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को चैलेंज किया कि ईवीएम को टैंपर करके दिखाएं लेकिन तब कोई सामने नहीं आया था। इसलिए ईवीएम की गड़बड़ी को ठीक करने की बात करना तो उचित है लेकिन बैलेट पेपर को फिर से लाना ठीक नहीं कहा जा सकता। कांग्रेस जैसी बड़ी और पुरानी पार्टी को तो इस पर गंभीरता से अपनी राय देनी चाहिए। 
 


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