करिश्माई नेता थे एम. करुणानिधि
| Agency - 08 Aug 2018

दक्षिण भारत का नजरिया ही कुछ दूसरे तरीके का रहा हैं। यहां पर ज्यादातर नेता फिल्मों में नाम कमाने के बाद आये और उनकी लोकप्रियता इतनी रही कि जनता उन्हें सिर-आंखों पर बैठा लेती है। ऐसे ही करिश्माई नेता थे एम. करुणानिधि जो कम से कम मेरी याददाश्त के समय से आंखों पर गाढ़ा चश्मा लगाये दिखे हैं। बताते हैं इसी चश्मे के पीछे उनका राजनीतिक व्यक्तित्व छिपा रहता था जिसे पढ़ना उनके राजनीतिक विरोधियों के लिए भारी पड़ जाता था। वही चेहरा अब चिरनिद्रा में चला गया है। तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और द्रविण मुन्नेत्र कषगम (डीएमके) प्रमुख एम. करुणानिधि काफी दिनों से बीमार चल रहे थे और सात अगस्त 2018 को शाम 6 बजकर 10 मिनट पर चेन्नई के कावेरी अस्पताल में उनका निधन हो गया। पिछले कुछ दिनों से उनकी हालत काफी गंभीर थी और तमिलनाडु समेत देश के अन्य भागों से भी उनके स्वस्थ होने की प्रार्थना की जा रही थी। एम. करुणानिधि तमिलनाडु के पांच बार मुख्यमंत्री रहे हैं। पटकथा लेखक से मुख्यमंत्री तक का सफर बेहद रोमांचक रहा है। उनका पूरा नाम मुत्तुवेल करुणानिधि था। मद्रास प्रेसिडेन्सी के तिरुककुवलाई में 3 जून, 1924 को उनका जन्म हुआ था। इस प्रकार जीवन का शतक वह पूरा करने वाले थे लेकिन नियति को यह मंजूर नहीं हुआ। एम. करुणानिधि ने 20 वर्ष की उम्र में तमिल फिल्म उद्योग की कंपनी ज्यूपिटर पिक्चर्स में पटकथा लेखक के रूप में अपना करियर शुरू किया। इसलिए उन्हें एक धुरंधर राजनेता के साथ ही लेखक, नाटककार और पटकथा लेखक के रूप में जाना जाता है। फिल्मों मंे वह चले गये लेकिन राजनीति में रुचि बचपन से ही थी। बताते हैं राजनीति में जाने की प्रेरणा उन्हें जस्टिस पार्टी के अलगिरिस्वामी के एक भाषण से मिली थी। जनता की नब्ज पहचानना उन्होंने बचपन से ही सीख लिया था। छात्र जीवन में ही भाषा आंदोलन में वे सक्रिय हो गये। उनकी उम्र सिर्फ 14 साल की रही होगी जब वह हिन्दी विरोधी आंदोलन से जुड़ गये। दक्षिण भारत के कितने ही नेता हिन्दी विरोध के चलते ही लोकप्रिय हुए हैं। एम. करुणानिधि ने इसी आंदोलन के चलते युवाओं को साथ लेकर एक संगठन बना लिया था। यह राजनीति की पहली सीढ़ी थी जो वे अनायास चढ़ गये। जुझारू युवाओं का जो संगठन करुणानिधि ने बनाया था, उसे बड़ी ताकत बनाने के लिए मीडिया का सहारा लेना पड़ा था। इस युवा संगठन ने ‘मनावर नेसन’ नामक एक अखबार निकाला जो कि हाथ से लिखकर तैयार किया जाता था और संगठन के लोग ही उसे जन-जन तक पहुंचाते भी थे। इस प्रकार लोगों से सम्पर्क का सशक्त माध्यम मिल गया था। इसके बाद ही श्री करुणानिधि ने छात्र संगठन बनाया जिसका नाम रखा तमिलनाडु तमिल मनावर मंद्रम। अपने 60 साल के राजनीतिक जीवन में एम. करुणानिधि राज्य के पांच बार मुख्यमंत्री बने। पहली बार उनका कार्यकाल 1969 से 1971 तक का रहा। इसके बाद 1971-76 और 1989 से 1991 और 1996 से 2001 तथा 2006 से 2011 तक मुख्यमंत्री रहे। तमिलनाडु की जनता ने राज्य की सत्ता बारी-बारी से अन्नाद्रमुक और द्रमुक को सौंपी लेकिन 2011 के बाद सुश्री जयललिता ने इस मिथक को तोड़ दिया और लगातार दो बार सरकार बनायी।करुणानिधि की एक खास बात यह रही कि राज्य में द्रमुक की सरकार बनी हो अथवा न बनी हो लेकिन वे अपनी सीट से हमेशा विजयी होते रहे। उनकी कर्मठता हर कार्य में झलकती रही है। राजनीति मंे कदम रखने से पहले तमिल फिल्म इंडस्ट्री मंे स्क्रिप्ट राइटर के रूप मंे काम करते रहे। उन्हें समाजवादी और बुद्धिवादी आदर्शों को बढ़ावा देने वाली समाज सुधारक कहानियां लिखने के लिए जाना जाता था। दूसरे शब्दों मंे कहें तो वे आदर्शवादी लेखक थे। फिल्मों में भी पटकथा लेखन उनका इसी दृष्टिकोण से रहा। उन्होंने 20 वर्ष की आयु में फिल्म राजकुमारी की पटकथा लिखी थी जो काफी लोकप्रिय हुई। इसके बाद उनकी शोहरत भी फैली और लेखनी भी मंझने लगी थी। उनके द्वारा लिखी गयी 75 पटकथाओं में राजकुमारी, अभिमन्यु, मंदिरी कुमारी, मरुद नाट्टु इलवरसी, मनागमन और देवकी जैसी फिल्में विशेष उल्लेखनीय रही हैं। राजनीति को भी फिल्मी कहानी की तरह जीने वाले इस नेता ने सिर्फ फिल्मों की पटकथा ही नहीं लिखी थी बल्कि कई लोकप्रिय नाटक भी उसके कलम से सृजित हुए। उन्हांेने मनिमागुडम, ओरे रदम,  पालानी अप्पन, तुक्कुमेड्ड, कगिदप्पू, नाने एरिवाली जैसे तमाम उच्चकोटि के नाटक लिखे। उन्होंने विश्वशास्त्रीय तमिल सम्मेलन 2010 के लिए अधिकारिक विषय गीत भी लिखा था। इसको ए.आर. रहमान ने संगीत दिया था। तमिल सिनेमा की एक फिल्म ने उनका करियर ही बदल दिया था। पराशक्ति फिल्म के माध्यम से करुणानिधि ने राजनीतिक विचारों का प्रचार करना शुरू कर दिया। पराशक्ति फिल्म तमिल सिनेमा में काफी असरदार साबित हुई। इस फिल्म ने द्रविड़ आंदोलन की विचारधारा का समर्थन किया था। इसके बाद में इसे 1952 में रिलीज किया गया था और बाक्स आफिस पर बहुत हिट फिल्म रही थी। तमिल साहित्य में उनका योगदान उसी तरह भुलाया नहीं जा सकता जैसे राजनीतिक जीवन में उन्होंने सफलता दर सफलता हासिल की। यह सच है कि हिन्दी विरोधी आंदोलन चलाने के कारण ही राजनीति में उनकी पकड़ मजबूत हुई थी। इसके बाद सन् 1957 में कुलिथालाई विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विधायक बने। डीएमके के संस्थापक सीएन अन्ना दुरई थे। सन् 1969 में उनकी मौत के बाद एम. करुणानिधि पार्टी के नेता बने गये। मजे की बात यह कि आज की प्रतिद्वन्द्वी राजनीतिक पार्टियां अन्नाद्रमुक और द्रमुक कभी एक ही हुआ करती थी। द्रविड़ अस्मिता के नाम पर इस पार्टी को जनता का भरपूर समर्थन भी मिला और एम. करुणानिधि तथा एमजी रामचन्द्रन की जोड़ी फिल्मी पटकथा लिखने के दौरान खूब जमती थी। एमजी रामचन्द्रन की हीरोइन जब जयललिता बनीं, तभी से इन दोनों नेताओं में  दरार पड़ी थी। एमजी रामचन्द्रन ने द्रमुक से अलग होकर अन्नाद्रमुक बना ली थी। एमजी रामचन्द्रन के जीवित रहते करुणानिधि उन्हें सत्ता से बाहर नहीं कर पाये थे लेकिन एमजी आर.के. निधन के बाद जब जानकी रामचन्द्रन और जयललिता के बीच पार्टी बिखर गयी, तब करुणानिधि सत्ता छीनने में सफल रहे। अन्नाद्रमुक की बागडोर बाद में पूरी तरह जयललिता के हाथ में आ गयी और करुणानिधि के साथ उनकी प्रतिद्वन्द्विता कई बार चरम तक पहुंची थी। सन् 1996 में करुणानिधि ने जयललिता के घर छापा डलवाया तो करोड़ों रुपये बरामद हुए और जयललिता को जेल जाना पड़ा था। जयललिता ने इसका बदला 2001 में लिया और चेन्नई में फ्लाईओवर बनाने में भ्रष्टाचार के आरोप में करुणानिधि और उनके पूर्व मुख्य सचिव केए नाम्बियार को आधी रात में गिरफ्तार किया गया था।
एम. करुणानिधि के दो बेटे एम.के अलागिरी और एमके स्टालिन राजनीति में हैं उनकी एक बेटी भी राजनीति में सक्रिय हैं। दोनों भाइयों में 2014 में वर्चस्व को लेकर झगड़ा शुरू हुआ था क्योंकि करुणानिधि अपने छोटे बेटे एम.के. स्टालिन को ज्यादा चाहते थे। एमके अलागिरी को द्रमुक से निकाल दिया गया था। उनका एक बेटा मुथु राजनीतिमें रुचि नहीं रखता और चैथा बेटा एमके तमिलरासू सामान्य जीवन जी रहे हैं। इस प्रकार एम. करुणानिधि की विरासत उनकी बेटी कनिमोझी और एमके स्टालिन कितनी संभाल पाते हैं, यह देखने की बात होगी। तमिलनाडु की राजनीति जिस तरह की चल रही है, उनमे करुणानिधि जैसे नेता का अभाव बहुत ही खलेगा।


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