कलंक के समान है महिला हिंसा
| Agency - 17 Aug 2018

महिलाओं की सुरक्षा के लिए सरकार ने अनेक कानून बनाए और बिल पास किये किन्तु अपराध कम होने का नाम ही नहीं ले रहे। एक मास मंे कम से कम 25 घटनाएं महिलाओं से सम्बन्धित होती हैं, इसका सबसे अच्छा एवं दर्दनाक उदाहरण है दिल्ली का। यदि हम पांच वर्ष पीछे मुड़कर देखेंगे तो स्पष्ट हो जाएगा।
भारत ही वह राष्ट्र है जहां नारी को हम माँ दुर्गा के रूप में जूझते हैं और उनकी वन्दना कर शक्ति की इच्छा रखते हैं। हमारे देश में प्रत्येक धर्म, समुदाय व जाति के लोग एक साथ मिलकर रहते हैं और सभी को समान अधिकार प्राप्त है। यहाँ प्रत्येक धर्म, समुदाय व जाति को सुरक्षा का अधिकार भी प्राप्त है। परन्तु बस हम यह कह सकते हैं कि सभी को सुरक्षा प्राप्त है, जबकि देश की आधी जनसंख्या, स्त्रियाँ चाहे वह किसी भी वर्ग की हो, को प्रत्येक पल असुरक्षा का बोध होता है। स्त्रियां जिनके माध्यम से ही मनुष्यों का इस पृथ्वी पर वजूद है, क्या हम इतनी बड़ी भूल कर सकते हैं कि उन्हीं को असुरक्षा के घेरे में छोड़ दें। स्वतंत्रता के पश्चात हमारे देश में नारियों की शिक्षा के प्रति बढ़े कदम उल्लेखनीय है लेकिन जिस प्रकार नारियों का शोषण हो रहा है वह समस्त विश्व में हमारे मस्तक को झुका रहा है। नारियों की शिक्षा के माध्यम से हम उन्हें आत्मनिर्भर बना रहे है। आज बड़े -महानगर व छोटे से कस्बों में महिलाएं पुरूषों से कन्धे मिलाकर आगे बढ़ती है। परन्तु जिन बड़े-बड़े महानगरों पर हम गर्व करते हैं वहीं सबसे अधिक महिलाओं का शोषण होता है। महिलाओं के विरूद्ध हो रहें अपमानों से लेकर ग्रामों में लोगों में आक्रोश है परन्तु क्या यह आक्रोश महिलाओं को सुरक्षित बना रहा है यह आज भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसका उत्तर भारत जैसी प्राचीन सभ्यता में ढूंढ़ पाना अत्यन्त कठिन है।
एक ओर जहां नारी की शक्ति रूप माँ दुर्गा की उपासना कर उनसे शक्ति प्राप्त करने की इच्छा करते है वहीं दूसरी ओर नारी सशक्तिकरण पर वाद-विवाद होता है।
नारियों के विरूद्ध हो रहे अपमानों में अपराधियों के साथ-साथ समाज की सोच का भी बहुत बड़ा दोष है। प्राचीन काल से ही मुगलों व अंग्रेजों के समय में हो रहे नारियों के शोषण ने समाज की सोच बदल कर रख दी जो आज भी महिलाओं को असुरक्षित महसूस करा रही है। वर्तमान में निर्भया, बदायूं, हिसार, आदि घटनाक्रमों ने सम्पूर्ण शब्द को प्रभावित किया। सभी महिलाओं की सुरक्षा के लिए सड़क पर उतरने व विरोध करने के लिए मजबूर किया। परन्तु क्या इन प्रदर्शनों व रैलियों से महिलाओं को सुरक्षा प्राप्त होती है जब तक समाज की उस विचारधारा को नहीं बदलते कि पुरूषों का स्थान स्त्रियों से ऊपर है। जब तक हम स्त्रियों को पुरूषों से निम्न समझेंगे तब तक हमारा देश स्त्रियों की सुरक्षा के प्रति सजग नहीं हो सकते हैं।
अब विचारधारा की वार्ता आरम्भ हुई है। तो उसमें मैं यह विचार रखता हूं कि मनुष्यों की विचारधारा में बदलाव मात्र नैतिकता व प्रदर्शनों के माध्यम से आ जाए तो यह असम्भव है। अगर नैतिकता के माध्यम से यह होता तो स्वतन्त्रता के पश्चात ही वह विचारधारा बदल जाती क्योंकि जो नैतिकता का भाव राष्ट्रपति महत्मा गांधी के जीवनकाल में देश में फैला था वह अब नहीं मिल सकता और मेरा यह विश्वास है कि सड़क पर हो रहे प्रदर्शनों के माध्यम से मनुष्यों की विचारधारा में निम्नता ही व्याप्त होती है।
अब यह प्रश्न अवतरित होता है कि जिस देश में जन्म लेने से पहले ही स्त्रियां असुरक्षित हैं वहां हम स्त्रियों को कैसे सुरक्षा प्रदान करें अर्थात विचारधारा में परिवर्तन कैसे लाएं। मेरा यह मत है कि कानून के माध्यम से ही यह हो सकता है। भले ही विचारधारा को बदलना मुश्किल हो लेकिन कानून के माध्यम से निम्न विचार रखने वालों के मन में भय उत्पन्न कर सकते है। कानून के माध्यम से ही अपराधियों को अपराध करने से पूर्व सैकड़ों बार विचार करना होगा। उन्हें भी यह ज्ञात होगा कि स्त्रियां जहां एक घर काम करने वाली साधारण मनुष्य है तो दूसरी ओर उनका रूप माँ दुर्गा के समान विशाल और पापियों को नष्ट करने वाला है।
महिलाओं  की सुरक्षा के लिए सरकार ने अनेक कानून बनाए और बिल पास किये किन्तु अपराध कम होने का नाम ही नहीं ले रहे। एक मास मंे कम से कम 25 घटनाएं महिलाओं से सम्बन्धित होती हैं, इसका सबसे अच्छा एवं दर्दनाक उदाहरण है दिल्ली का। यदि हम पांच वर्ष पीछे मुड़कर देखेंगे तो स्पष्ट हो जाएगा। गत वर्ष 2013 के अन्तिम मास को जो दर्दनाक, शर्मनाक एवं मन को चीर देने वाली घटना घटित हुई उसने सम्पूर्ण राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया, समस्त भारतवासी उस स्त्री को न्याय के खातिर सड़क पर उतर आये। जी हाँ मैं निर्भया काण्ड की बात कर रहा हूँ। इस घटना को घटित हुए एक दिन भी पूर्ण नहीं हुआ होगा कि देश के अन्य हिस्सों मंे भी बलात्कार व महिलाओं से सम्बन्धित अन्य संगीन अपराध सामने आए तो इस क्रूरतापूर्ण घटना से आप स्वयं नारियों की समाज मंे क्या स्थिति है, इसका अंदाजा लगा सकते हैं, वे कितनी सुरक्षित हैं। 
प्राचीनकाल मंे नारी को ही बलिदान देना पड़ता था, कभी सती प्रथा के रूप मंे तो कभी अग्नि परीक्षा के रूप मंे। नारी न पहले सुरक्षित थी और न अब है। महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ गया है कि आज वो घर से बाहर निकलने से डरती हैं, जब वो अपना सम्मान खो देती हैं तो अपने स्वाभिमान के खातिर आत्महत्या कर लेती है। पुरुष को संसार मंे लाने वाली इस अनमोल कृति ने कभी पत्नी बनकर, बहन बनकर तो कभी माँ बनकर अपने कर्तव्यों को निःस्वार्थ पूर्ण किया है, तो हम पुरुषों का भी दायित्व बनता है कि हमें भी हर तरह से हर कदम पर उनका साथ दे क्योंकि जहां नारी का सम्मान है, वहीं देवों का वास है।
जीवन रूपी रथ के दो पहिये हैं नर और नारी,
जिस पर पूरी होती है जीवन की सवारी,
पत्नी के प्रेम से, बहू के कर्तव्य से, तथा
माँ की ममता से जिसने सीचीं दुनिया सारी
वह कोई और नहीं है नारी है नारी।  
 


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