निवेशकों के रुख से बिजली क्षेत्र में कंपकंपी
| Manoj Chaudhary - 10 Mar 2018

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राज्यों के मुख्यमंत्री देश-विदेश के निवेशकों को उद्यम लगाने के लिए जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं और उद्यमी इसके लिए तैयार भी हो गये। उद्योगों के लिए सबसे बड़ी जरूरत बिजली की है। बिजली के क्षेत्र में भी निवेशकों ने अपनी रुचि दिखाई है लेकिन बिजली के क्षेत्र में रिजर्ब बैंक की अधिसूचना के बाद निवेशकों की रुचि कम हो रही है और वे स्टील की तरफ अपना झुकाव प्रदर्शित करने लगे हैं। इससे बिजली क्षेत्र संकट में पड़ता दिख रहा है। 
बिजली क्षेत्र में 80,000 मेगावॉट क्षमता के  चल रहे या निर्माणाधीन उत्पादन संयंत्र विभिन्न वजहों से दबाव में आ सकते हैं। पिछले महीने आई भारतीय रिजर्व बैंक की अधिसूचना के बाद उनकी उधारी दिवालियेपन की ओर बढ़ सकती है। बहरहाल विश्लेषक बिजली क्षेत्र की अलग प्रवृत्ति को लेकर चिंतित हैं, जो स्टील क्षेत्र की तुलना में अलग है। अगर बिजली क्षेत्र में यह संपत्तियां फंसती हैं तो बड़े कारोबारियों के आने की संभावना कम हो सकती है। कोयले की आपूर्ति कम होने, दीर्घावधि बिजली खरीद समझौते (पीपीए) न होने,  बिजली वितरण कंपनियों से प्राप्त होने वाले बकाये के मिलने में देरी और नियामकीय आदेश में देरी ऐसी वजहें हैं जिससे ये परियोजनाएं फंस सकती हैं और नया प्रबंधन स्थिति में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं कर सकता। 80,000 मेगावॉट में से 20,000 मेगावॉट से ज्यादा क्षमता के लिए करीब 1,000 अरब रुपये का निवेश हुआ है और जरूरी ईंधन आपूर्ति समझौते के साथ दीर्घावधि पीपीए हुआ है, लेकिन विभिन्न क्षेत्रो से जुड़ी वजहों से कर्जदाताओं का बकाया है। स्टील क्षेत्र में जहां दबाव में पड़ी संपत्तियों में निजी इक्विटी कंपनियां और प्रतिस्पर्धी कंपनियां जैसे जेएसडब्ल्यू, आर्सेलर मित्तल, वेदांता और टाटा स्टील बोली लगा रही हैं, वहीं बिजली क्षेत्र में ज्यादातर निजी कंपनियां दबाव में हैं। 
दिवालिया समाधान प्रक्रिया से गुजर रही बिजली कंपनियों में से एक के साथ काम कर रहे इंसॉल्वेंसी के एक पेशेवर ने क हा कि परियोजना पूरी करने की लागत इतनी ज्यादा है कि कोई भी इन संपत्तियों में हाथ नहीं लगाना चाहता। यहां तक कि इन कंपनियों के  प्रवर्तक भी संभवतः पिछले साल के अध्यादेश की बाध्यता के चलते बोली नहीं लगा सकेंगे, जिसमें खराब कर्ज वाले प्रमोटरों को बोली से बाहर रखा गया है। स्टील क्षेत्र में बोली लगा रही हर कंपनी अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए बोली लगा रही है और उसे मांग बढने की संभावना है। बिजली और स्टील दोनों ही क्षेत्रों में मांग में बढ़ोतरी कम रही है, लेकिन बिजली क्षेत्र की समस्या ज्यादा जटिल है क्योंकि यह राज्य सरकारों से जुड़ी है और नियमन के दायरे में आती है। वीसा पावर, जिसका कुल दावा करीब 17 अरब रुपये का है, के मामले को देख रहे एक सूत्र ने कहा कि दीवालिया पेशेवर सलाहकारों को यह जांच करने में लगा रहे हैं कि लंबित परियोजनाएं पूरी की जा सकती हैं या नहीं। हर हाल में व्यवहार्यता अध्ययन किया जा रहा है। इसके अलावा आईपी कंपनी को चलाने की योजना पर काम करेंगे और बोली का दायरा भी तैयार किया जाएगा। दिलचस्प है कि समाधान प्रक्रिया में चल रही बिजली कंपनियों में सरकारी कंपनी तेलंगाना स्टेट नॉर्दर्न पावर कंपनी लिमिटेड शामिल है। इसकी समाधान प्रक्रिया जनवरी 2018 में शुरू हुई। 
स्टील क्षेत्र में प्रमोटर अपनी संपत्ति की बिक्री को लेकर निश्चिंत हैं और जब तक अध्यादेश उन्हें रोकता नहीं है, वे अपनी कंपनी के लिए बोली लगा सकते हैं, वहीं करीब 25,000 मेगावॉट क्षमता की संकटग्रस्त ताप बिजली कंपनियां दिवाला एवं दीवालियापन संहिता (आईबीसी) के दायरे से बाहर हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड ने हाल ही में खबर प्रकाशित की थी कि इन संपत्तियों के खरीदार नहीं मिल रहे हैं। परियोजना की ज्यादातर प्रमोटर कंपनियां परियोजना से बाहर निकल जाना चाहती हैं, चाहे वे चल रही हों या निर्माणाधीन हों। इस माध्यम से वे अपने कर्ज का बोझ हल्का करना चाहती हैं। संकटग्रस्त बिजली उद्योग के कुल कर्ज का सबसे बड़ा 30 प्रतिशत हिस्सा देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक का है। इसके बाद पंजाब नैशनल बैंक दूसरे स्थान पर है। इन फंसी परियोजनाओं का कुल बकाया 1,440 अरब रुपये है। अडाणी, एस्सार, जेपी, लैंको  के बिजली संयंत्र संकटग्रस्त   हैं। परियोजनाओं की सूची में अदाणी, एस्सार, जेपी और लैंको द्वारा प्रवर्तित ताप बिजली परियोजनाओं सहित देश की 34 बिजली परियोजनाएं संकटग्रस्त परियोजनाओं की सूची में शामिल हैं, जिनकी कुल क्षमता 40 गीगावॉट से ज्यादा है। संसदीय समिति की रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। ऊर्जा पर बनी संसद की स्थायी समिति की ओर से संसद में पेश रिपोर्ट के मुताबिक रिजर्व बैंक के आंकड़ों से पता चलता है कि बिजली क्षेत्र में संकटग्रस्त गैर निष्पादित संपति का कुल बकाया जून 2017 में 1.74 लाख करोड़ रुपये था। अदाणी समूह के कोरबा पश्चिम संयंत्र पर 3,099 करोड़ रुपये जबकि उसकी महाराष्ट्र की तिलौरा परियोजना पर 11,665 करोड़ रुपये कर्ज है। इसी तरह से एस्सार की महान पर 5,951 करोड़ रुपये और तोरी परियोजना पर 3,112 करोड़ रुपये कर्ज है। ऐसे हालात में निवेशक उधर रुचि नहीं दिखा रहे हैं। (हिफी)
 


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