विलक्षण पत्रकार थे कुलदीप नैयर
| Agency - 23 Aug 2018

भारत ही नहीं भारत के बाहर भी जिस पत्रकार का स्तम्भ (काॅलम) छापा जाता हो और पाठक उसका पूरा सप्ताह इंतजार करते हों तो उसे सामान्य पत्रकार कैसे कहा जा सकता है। कुलदीप नैयर ऐसे ही पत्रकार थे, जिनके लिखे गये सिंडिकेट काॅलम विश्व के 80 से ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे। एक विशेष दिन ही उन्हें प्रकाशित करने का निर्देश रहता था। जाने-माने समाचार पत्र डेक्कन हेराल्ड (बेंगलुरू), द डेली स्टार, द सण्डे गार्जियन, द न्यूज, द स्टेट्स मैन, द एक्सप्रेस ट्रिव्यून पाकिस्तान, डाॅन पाकिस्तान समेत कितने ही समाचार पत्र कुलदीप नैयर के स्तम्भ का इंतजार करते थे। इतने लोकप्रिय पत्रकार, काॅलमनिस्ट और लेखक कुलदीप नैयर का गत 22 अगस्त की रात नई दिल्ली के एक अस्पताल में निधन हो गया। मृत्यु तो एक अटल सत्य है। उसपर किसी का नियंत्रण नहीं। पिछले कुछ दिनों में भारत की कई महान हस्तियों ने इस संसार को अलविदा कहा है - अभी 16 अगस्त को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी हम सभी को छोड़ कर चले गये। उससे पूर्व जाने माने साम्यवादी नेता और लोक सभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी का निधन हो गया। भारतीय मूल के मशहूर लेखक नाॅयपाल भी इस नश्वर संसार को छोड़ गये। क्रिकेट के कभी सिरमौर रहे अजित वाडेकर भी चले गये। अब कई दशको से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय और डिस्टेन्ड नेवर, एटेल आफ दी कांटीनेन्ट, इंडिया आफ्टर नेहरू, वाल एट बांधा, इंडिया पाकिस्तान रिलेशन शिप, इंडिया हाउस, स्कूप, द डेलुक्स ओल्ड जैसी किताबे लिखने वाले कुलदीप नैयर भी इस दुनिया को छोड़ कर चले गये। पत्रकार जगत उनके इस तरह से चले जाने पर निःशब्द हो गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत राजनीति जगत के कई लोगों ने कुलदीप नैयर के निधन पर गहरा दुख जताया है। श्री मोदी ने कहा कि कुलदीप एक निर्भीक और निडर पत्रकार थे। 
कुलदीप नैयर का जन्म 14 अगस्त 1924 को सियालकोट (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उन्होंने स्कूली शिक्षा सियालकोट में प्राप्त की और विधि की डिग्री लाहौर से। यू॰एस॰ए॰ से पत्रकारिता की डिग्री ली। दर्शनशास्त्र में पी॰एच॰डी॰। भारत सरकार के प्रेस सूचना अधिकारी के पद पर कई वर्षों तक कार्य करने के बाद वे यू॰एन॰आई॰, पी॰आई॰बी॰, ‘द स्टैट्समैन, ‘इण्डियन एक्सप्रेस के साथ लम्बे समय तक जुड़े रहे। वे पच्चीस वर्षों तक ‘द टाइम्स लन्दन के संवाददाता भी रहे। नैयर को 1997 में राज्यसभा का सदस्य बनाया गया।
शुरूआत में नैयर एक उर्दू प्रेस रिपोर्टर थे। वह दिल्ली के समाचार पत्र द स्टेट्समैन के संपादक थे और उन्हें भारतीय आपातकाल (1 975-77) के अंत में गिरफ्तार किया गया था। वह एक मानवीय अधिकार कार्यकर्ता और शांति कार्यकर्ता भी थे। वह 1996 में संयुक्त राष्ट्र के लिए भारत के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य थे। 1990 में उन्हें ग्रेट ब्रिटेन में उच्चायुक्त नियुक्त किया गया था, अगस्त 1997 में राज्यसभा में नामांकित किया गया था। वह डेक्कन हेराल्ड (बेंगलुरु), द डेली स्टार, द संडे गार्जियन, द न्यूज, द स्टेट्समैन, द एक्सप्रेस ट्रिब्यून पाकिस्तान, डॉन पाकिस्तान, प्रभासाक्षी, सहित 80 से अधिक समाचार पत्रों के लिए 14 भाषाओं में कॉलम और ऐप-एड लिखते थे। ‘बिटवीन द लाइन्स’, ‘डिस्टेण्ट नेवर - ए टेल ऑफ द सब काॅनण्टीनेण्ट, ‘इण्डिया आफ्टर नेहरू, ‘वाल एट वाघा, इण्डिया पाकिस्तान रिलेशनशिप, ‘इण्डिया हाउस, ‘स्कूप (सभी अंग्रेजी में)। ‘द डे लुक्स ओल्ड’ के नाम से प्रकाशित कुलदीप नैयर की आत्मकथा भी काफी चर्चित रही है। सन् 1985 से उनके द्वारा लिखे गये सिण्डिकेट कॉलम विश्व के अस्सी से ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। कुलदीप नैयर पर छद्म धर्मनिपेक्ष होने के साथ-साथ हिंदू विरोधी होने के भी आरोप समय-समय पर लगता रहा। नैयर ने तो यहाँ तक कहा था कि प्रधानमंत्री वाजपेयी को कानून बनाना चाहिए जो किसी राष्ट्रीय स्वयं सेवक को उच्च पद के लिए अयोग्य बनाये। एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय दैनिक में अन्ना हजारे के अन्दोलन के लिए नैयर ने यह कहा कि इस आन्दोलन को अनशन से अलग रखते तो अच्छा होता और इसका ठीकरा उन्होंने टीम अन्ना के सदस्यों पर फोड़ा। उन्होंने कहा कि ये लोग ध्यान खींचने के लिए इस नाटकीय कदम को उठाना चाहते थे। विदित रहे कि अन्ना ने स्वयं ही यह स्वीकारा था कि अनशन करना उनकी स्वयं की इच्छा थी, न कि किसी और की। अन्ना यह कह चुके हैं कि वे कोई बच्चे नहीं हैं। वे वही कार्य करते हैं जिसकी गवाही उनकी आत्मा देती है। कुलदीप नैयर को नॉर्थवेस्ट यूनिवर्सिटी द्वारा ‘एल्यूमिनी मेरिट अवार्ड (1999) सन् 1990 में ब्रिटेन के उच्चायुक्त नियुक्त किये गये। सन् 1996 में भारत की तरफ से संयुक्त राष्ट्र संघ को भेजे गये प्रतिनिधि मण्डल के सदस्य भी रहे। अगस्त, 1997 में राज्यसभा के मनोनीत सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए। सरहद संस्था की ओर से दिया जाने वाला संत नामदेव राष्ट्रीय पुरस्कार 2014 भी पत्रकार कुलदीप नैय्यर को मिला। इससे पहले ये पुरस्कार विजयकुमार चोपडा, एस॰ एस॰ विर्क, गुलजार, यश चोपड़ा, माँटेक सिंह अहलुवालिया, जतिंदर पन्नू, सत्यपाल सिंह, के॰ पी॰ एस॰ गिल को दिया गया है। इसके अलावा मोदी की सरकार में 23 नवम्बर, 2015 को वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक कुलदीप नैयर को पत्रकारिता में आजीवन उपलब्धि के लिए रामनाथ गोयनका स्मृति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें यह पुरस्कार दिल्ली में आयोजित पुरस्कार वितरण समारोह में केद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने प्रदान किया था। 
कुलदीप नैयर सिर्फ पत्रकार ही नहीं थे। वे भारत के एक ऐसे प्रतिनिधि राजदूत थे, जिसने सारी दुनिया में भारत की आवाज अपनी कलम के जरिए मुखर की। सियालकोट में जन्मे कुलदीप नैयर ने एक सप्ताह पहले ही चैदह अगस्त को अपना जन्म दिन मनाया था। जिन्दगी का शतक पूरा करने में पांच साल रह गए। लाहौर से पढ़ाई की। फिर वहीं से कानून पढ़ा । नॉर्थवेस्ट यूनिवर्सिटी से उन्होंने मीडिया की पढ़ाई की और फिर अनेक भूमिकाओं में वे नजर आए। एक पत्रकार के रूप में चैदह भाषाओं के अस्सी से अधिक समाचार पत्र पत्रिकाओं में लिखना विश्व रिकॉर्ड है, जो कभी नहीं टूटेगा। ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त रहे, भारत सरकार के मुख्य सूचना अधिकारी रहे, राज्यसभा के सदस्य रहे, आपातकाल के दौरान जेल भेजे गए थे। स्टेट्समैन के संपादक के तौर पर इस अखबार ने वैचारिक ऊंचाइयां हासिल कीं। इसके बावजूद उन्होंने हमेशा अपने को एक साधारण नागरिक ही माना। मानव अधिकारों को लेकर उनकी दुनिया भर में पहचान थी। भले ही इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान जेल गए ,लेकिन उनके पिता जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, खुद इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, इंद्रकुमार गुजराल और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राजनेता उनसे अंतरराष्ट्रीय मसलों पर अपनी राय लेते थे। पाकिस्तान से जुड़े मसलों पर तो उन्हें महारथ हासिल थी। जितने लोकप्रिय भारत में, उससे ज्यादा पाकिस्तान में। भुट्टो से लेकर नवाज शरीफ तक सभी उनकी कद्र करते थे। दोनों देशों के बीच अच्छे संबंधों के लिए करीब बीस साल कैंडल मार्च आयोजित करते रहे। दोनों देशों की जेलों में बंद सजा पूरी कर चुके कैदियों की रिहाई के लिए भी उन्होंने बहुत काम किया। इन्हें भूलना आसान नहीं। 
 


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