निजता की आजादी में न हो नीचता
| Agency - 07 Sep 2018

छब्बीस देशों के बाद भारत 27वां ऐसा मुल्क बन गया है जहां अब कानूनन दो वयस्क इंसान आपस में अप्राकृतिक संबंध बना सकेंगे। उनको ऐसा करने में अब किसी तरह की बाधा उत्पन्न नहीं होगी क्योंकि पहले ऐसे संबंध अपराध की श्रेणी में आते थे और धारा 377 के तहत दंड के भागी होते थे। मौजूदा वक्त इस बात की गवाही देता है कि समाज में सभी वर्ग विशेष को संबंध और व्यवहार बनाने की छूट होनी चाहिए। पर, मर्यादित और संस्कारी तरीके से हो तो ज्यादा बेहतर होगा। चिंता सिर्फ और सिर्फ इसी बात की है कि पूर्व में एलजीबीटी समुदाय के लोगों ने आपस में संबंध बनाते वक्त किसी की मर्यादा का ख्याल नहीं रखा। उनके मन में जहां भी आया, सड़क हो, बाजार हो चाहें सार्वजनिक स्थान हर जगहों पर उन्होंने संबंध बनाने के नाम फूहड़ता का प्रदर्शन किया। उनकी उन हरकतों से समाज अबतक शर्मसार ही होता आया है। इसलिए लाइसेंस मिलने के बाद कहीं निजता की स्वतंत्रता पर नीचता का नाच न होने लगे। कोर्ट ने अगर उनको बराबरी की श्रेणी में रख दिया है तो उनको अदालत का सम्मान करना चाहिए। संबंध क्रिया पर पूरी तरह से पर्देदारी रखनी चाहिए ताकि समाज के दूसरे लोग भी गर्व महसूस कर सकें।    
कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर युद्ध स्तर पर तर्क-वितर्क और बहस छिड गई। एक वर्ग के अलावा ज्यादातर लोगों ने फिलहाल इस फैसले पर अपनी असहमति जताई है। वहीं आरएसएस ने ऐसे संबंधों का समर्थन नहीं करने को लेकर एक बयान दिया है। उनका मानना है कि वह ऐसे संबंधों के खिलाफ नहीं है लेकिन इसको बढ़ावा मिले उसके सख्त खिलाफ हैं। एक डर ये भी है कि इसके बाद एलजीबीटी समुदायों की संख्या में कहीं और न इजाफा हो जाए और उनमें हमारे सामान्य परिवारों के लोग भी शामिल न हो जाएं। खैर, पूरी घटना के पीछे झंाककर देखें तो कई ऐसे भी दृश्य दिखाई पड़ते हैं जो भविष्य के खतरे का आभास कराते हैं। कानून के दुरुपयोग होने की चिंता सताने लगी है। देश के पंच परमेश्वरों के फैसले पर हमें सवाल उठाने का हक नहीं है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति रोहिंगटन एफ नरीमन और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की संविधान पीठ ने धारा 377 के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं का संयुक्त रूप से निपटारा करके देश में एक नई बहस को जन्म जरूर दे दिया है।
विगत कुछ वर्षों से केंद्र सरकार की तरफ से एलजीबीटी समुदाय को हर वह अधिकार मुहैया कराए गए हैं जो देश के किसी आम नागरिक को मिले हुए हंै! और मिलना भी चाहिए। आखिर सबका खून एक ही जैसा है। फर्क सिर्फ नियति और फितरत का है। इस मामले में मुख्य न्यायाधीश के अलावा न्यायमूर्ति रोहिंगटन एफ नरीमन, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने अलग-अलग परंतु सहमति का फैसला आखिर ले ही लिया है लेकिन पांच जजों में दो जजों की राय फैसले से भिन्न थी। उनका मत 377 को एकदम खत्म करना नहीं था पर, हां इसी धारा में संशोधन कर उन्हें सहूलियतें देने पर जरूर था। लेकिन अंत में हुआ वहीं जो बाकी तीन जजों ने चाहा। आखिर में पांचों जजों ने संयुक्त रूप से फैसला देकर एलजीबीटी समुदाय के लोगों को पिछले सत्तर साल से चल रही लड़ाई पर विराम लगाकर उन्हें जीतने की सौगात दे दी। फैसले के बाद लोग सड़कों पर खुशी से झूमने लगे। मुंबई में फिल्ममेकर करण जौहर के घर तांता लग गया। दिल्ली के ताज होटल में महज एक घंटे के भीतर हजारों की संख्या में एलजीबीटी के लोग एकत्र होकर होटल परिसर में ढोल-नगाड़े बजाकर खुशी का इजहार करने लगे। समलैंगिकता की आजादी को लेकर एलजीबीटी ने अदालत में लंबी लड़ाई लड़ी है। सन् 2009 में नाज फाउंडेशन की याचिका पर कोर्ट ने धारा 377 को हल्का कर दिया था। फिर 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के पूर्व हल्के किए फैसले को पलट दिया था। इससे समुदाय में नाराजगी का माहौल उत्पन्न हुआ। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में नृत्यांगना नवतेज जौहर, पत्रकार सुनील मेहरा, शेफ ऋतु डालमिया, होटल कारोबारी अमननाथ और केशव सूरी एवं व्यवसायी आयशा कपूर और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के बीस पूर्व तथा मौजूदा छात्रों ने याचिका दायर की, जिस पर संविधान पीठ ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। इन सभी ने दो वयस्कों द्वारा परस्पर सहमति से समलैंगिक यौन संबंध स्थापित करने को अपराध के दायरे से बाहर रखने का अनुरोध करते हुए धारा 377 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। जिस पर कोर्ट ने उनकी बात को मानकर कुल मिलाकर एकतरफा फैसला सुनाकर उन्हें खुशी से झूमने का मौका दिया।
सामाजिक सौहार्द के लिहाज से फैसले के बाद एलजीबीटी समुदाय को अब इतना ख्याल रखना चाहिए कि अपने यौन इच्छापूर्ति के कारण किसी दूसरे के मानवीय मूल्यों का अहित न हो। हर वर्ग की मर्यादाओं की परवाह करनी चाहिए। ये सब पर्दे में हो तो बेहतर होगा। खुलेआम नहीं? क्योंकि समाज को दिक्कत बस यही है कि ये लोग सब कुछ खुलेआम करते है जिससे दूसीे लोग शर्मसार होते हैं। अदालत के अलावा उन्हें अब सामाजिक समरसता का भी ध्यान रखना होगा। सबसे पहले इंग्लैंड ने समलैंगिकता की आजादी पर मोहर लगाई थी, लेकिन तभी से उनके यहां से कोई अप्रिय घटना नहीं घटी। इसके बाद कनाडा, अमेरिका, माल्टा के अलावा पच्चीस और देशों ने आजादी दे दी। पूरे संसार में अब 27 ऐसे देश हैं जहां समलैंगिकता के लिए संबंध बनाना फ्री कर दिया है। हालांकि इस्लामिक देश इस प्रथा को आज भी हिकारत की नजरों से देखते हैं क्योंकि इस्लाम में अप्राकृतिक संबंध को हराम माना गया है। कुछ ऐसा ही भारत के गांवों में वास करने वाली जनसंख्या भी मानती है। महानगरों के अलावा ग्रामीण परिवेश के लोग इस प्रथा पर बात करना भी उचित नहीं समझते। गांव के लोग समलैंगिकता को पाप और बदनामी की श्रेणी में रखते हैं। जिस पुरूष में ये लक्षण देख लेते हैं तो उसका सामाजिक बहिष्कार कर देते हैं। उससे लोग दूरी बनाकर रखते हैं। इसलिए समलैंगिकता संबंधों पर उनकी सोच को बदलना आज भी पहाड़ तोड़ने जैसा है। एक तौर पर देखा जाए तो ये प्रथा अभी महानगरों तक ही सीमित है, गांव अभी दूर हैं। 
 


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