दलित कानून पर मोदी का दाँव पड़ा उल्टा
| Agency - 08 Sep 2018

समाज की अगड़ी जातियों की तरफ से 06 सितम्बर को दलित कानून के खिलाफ भारत बंद मोदी सरकार के गले की फांस बन गया है। सरकार को यह कत्तई उम्मीद नहीं थी कि सोशलमीडिया का गुस्सा सड़क पर इतना कारगर और सफल हो सकता है। अगड़ी जातियों की नाराजगी 2019 में उसके लिए भारी पड़ सकती है। भाजपा और कांग्रेस ने वोट बैंक और सत्ता के लिए संसद में बिल के जरिए जो घिनौनी साजिश रची वह समाज को बांटने की साजिश है। अनुसूचित जाति और जनजाति कानून पर सुप्रीमकोर्ट के खिलाफ सरकार को जाने की क्या आवश्यकता थी? क्या दलित उत्पीड़न की इतनी घटनाएं हो रही हैं कि उसके लिए पूरी संसद एक साथ सारे मतभेद भुलाकर एक मंच पर आ गयी। क्या यह मोदी सरकार की वोट बैंक की सियायत का हिस्सा नहीं है। संविधान और संसद देश में सामाजिक समरसता, समानता और भेदभाव मिटाने की बात करती है लेकिन यहां तो नजारा ही अलग है दलित एक्ट पर पूरी संसद एक हो जाती है लेकिन जब अपने अधिकारों को लेकर अगड़ी जातियां भारत बंद का एलान करती हैं तो उन पर लाठियां बरसाई जाती हैं और पुलिस उनकी पिटाई करती है। समाज की सबसे बुद्धजीवी जाति को सड़क पर क्यों उतरना पड़ा। क्यों रोकनी पड़ी रेल और करनी पड़ी आगजनी और तोड़फोड़। एससी-एसटी कानून क्या वास्तव में अगड़ी जातियों के खिलाफ काला कानून है। इस संशोधन पर संसद की राजनीति गर्लफ्रेंड क्यों बन गयी। संसद में विपक्ष नाम की संस्था क्यों खत्म हो गयी। भाजपा की वोट बैंक की सियासत में कांग्रेस और दूसरे दलों ने अगड़ी जातियों की अनदेखी का हवन क्यों किया। राष्ट्रीय हित के मसलों पर राजनैतिक दलों में इतनी एकता क्यों नहीं दिखाई देती। संसद में कई अहम बिलों पर राजनीतिक दल खास तौर पर भाजपा और कांग्रेस बंटी क्यों हैं। तमाम ऐसे सवाल हैं जिसका जवाब राजनीति को देना पड़ेगा।  
भारत की राजनीति में आमतौर से बेहद कम मौके आते हैं जब सत्ता और विपक्ष किसी बिल पर इतनी एकजुटता दिखाएं। दलित कानून पर सत्ता के साथ विपक्ष का आना यह साबित करता है कि भारत में अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के साथ अगड़ी जातियों के लोग अत्याचार करते हैं। 22 फीसदी जातियों का शोषण 78 फीसदी जातियां करती हैं। उन्हें समाज की मुख्यधारा में नहीं आने दिया जाता। उनके अधिकारों के साथ सामाजिक अत्याचार किया जाता है। कम से कम संसद की एकजुटता तो यही संदेश देती है। निश्चित रुप से दलितों के साथ अत्याचार खत्म होने चाहिए लेकिन दलित कानून की आड़ में अगड़ी जातियों की माॅब लिंचिंग कहां तक उचित हैं। अगड़ी जातियां दलित उत्पीड़न और उनके अधिकारों के कत्तई खिलाफ नहीं हैं, वह सिर्फ पारदर्शी कानून लाने की बात करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दलित कानून खत्म करने की बात तो कभी नहीं कही। अदालत ने तो सिर्फ इतना कहा था कि सिर्फ आरोप लगाने से किसी के खिलाफ दलित उत्पीड़न का मामला नहीं दर्ज होना चाहिए। मामले की सक्षम अधिकारी से जांच होनी चाहिए। अगर जांच में आरोप सत्य पाए जांय तो मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए। फिर सुप्रीमकोर्ट ने गलत क्या कहा था जिस पर मोदी सरकार ने अदालत की अवमानना कर ससंद में यह काला कानून पास कराया। संसद में विपक्ष नाम की संस्था खत्म हो गयी। सरकार कहती है कि उसने दलित कानून में कोई बदलाव नहीं किया है वह जैसे था उसी तरफ लागू किया है। फिर संसद में नया बिल लाने की आवश्यकता क्या थी। अदालत ने इसका अस्तित्व खत्म नहीं किया था। सरकार को फिर बिल क्यों लाना पड़ा। 
संसद और राजनीतिक दलों को सामाजिक समरसता की इतनी चिंता है तो आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत क्यों नहीं की जाती है। धारा 370 और 35-ए पर आम राय क्यों नहीं बनती है। एक देश एक कानून, एक शिक्षा, वन नेशन, वन इलेक्शन पर राजनीति क्यों बंट जाती है। तीन तलाक पर कांग्रेस मोदी सरकार का साथ क्यों नहीं देती है। संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण की बात क्यों अटकी है। घुसपैठ मसले पर संसद में हंगामा क्यों खड़ा किया जाता है। बंगलादेश से दिल्ली तक सियासी बवाल क्यों खड़ा किया जाता है। मोदी सरकार संसद में राम मंदिर निर्माण के लिए दलित एक्ट की तरह बिल क्यों नहीं लाती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्यों कहते हैं कि आरक्षण मेरी लाश पर खत्म होगा। अमितशाह क्यों कहते हैं कि आरक्षण नहीं खत्म होगा। 
आरक्षण समाज में क्या आर्थिक असमानता नहीं बढ़ा रहा है। भाजपा संघ प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान पर क्यों नहीं गौर करती जो उन्होंने बिहार में कहा था कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोगों से रसाई गैस की सब्सिडी छोड़ने की अपील करते हैं। बाद में यह कानून भी लाते हैं कि जिसकी आय 10 लाख सालाना है उसे सब्सिडी नहीं मिलेगी। लेकिन उन्होंने यह अपील क्यों नहीं की कि आरक्षण का लाभ लेने वाला मलाईदार तबका खुद को आरक्षण से अलग रखे। वह गैस सब्सिडी की तरह आरक्षण का लाभ लेना छोड़ दे। संसद में दलित और पिछड़े समाज के जो नेता आरक्षण का लाभ ले रहे हैं क्या उन्हें आरक्षण की आवश्यकता है। क्या समाज में अगड़ी जाति का होना गुनाह है? अगर सिर्फ संवैधानिक शब्दों से अमीरी गरीबी की पहचान होती है तो क्या दलित शब्द सामाजिक शोषण और पिछड़ेपन की परिभाषा है जबकि सवर्ण संपन्नता का परिचायक।
राजनेता सत्ता के लिए समाज को बांटने की साजिश क्यों रच रहे है? क्या आरक्षण और दलित कानून से अगड़ों का संवैधानिक शोषण कर सामाजिक समानता लायी जा सकती है। क्या इस तरह के कानूनों से सामाजिक असमानता की खाई और भेदभाव को पाटा जा सकता है। निश्चित रूप से सरकारें सत्ता के लिए कितने नीचे गिर सकती हैं इसका ताजा उदाहण दलित एक्ट है। अभी तक अगड़ी जातियां भाजपा का मूल वोटर रही हैं लेकिन अब वहीं सरकार के खिलाफ लामबंद खड़ी हैं जबकि दलित एक्ट पर सरकार अपने ही सांसदों की वजह से बैकफुट पर आ गयी थी। रामबिलास पासवान, उदितराज और आठवले के दबाव में आकर सरकार बचाने के लिए ऐसा किया गया क्योंकि दलित सांसदों ने भारत बंद करने का एलान किया था। सरकार को आशंका थी कि कहीं पार्टी के दलित सांसद एकजुट हो गए तो मुश्किल हो जाएगी, जिसकी वजह से सरकार बचाने के लिए सुप्रीमकोर्ट की अनदेखी कर इस बिल को संसद में लाया गया। क्योंकि संसद में कुल एससी-एसटी के 131 सांसद हैं, जबकि भाजपा के पास संबंधित जातियों से 67 सांसद हैं। पूरे देश में इस समुदाय की 20 करोड़ की आबादी है। बिल पर जहां दलित सांसद सरकार पर दबाब बनाने पर कामयाब रहे, वहीं अगड़ी जाति से जुड़े सांसदों ने गुस्से को पी लिया और मौन रहे। जिसकी वजह से सवर्ण समाज में और उबाल है। दलितों को लुभाने के लिए मोदी सरकार ने जो चाल चली थी अब वह दांव उल्टा पड़ता दिखता है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में इसका असर साफ दिखेगा। क्योंकि इन राज्यों में सवर्ण आंदोलन की आग बेहद तीखी दिखी है। 2019 में अगड़ी जातियों का गुस्सा और नोटा का विकल्प उसकी सियासी राह का बड़ा रोड़ा बन सकता है। 
 


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