मोदी सरकार को राजन की मदद
| Agency - 11 Sep 2018

बैंकों की खस्ताहाली और डूबते कर्जों के भंवर में फंसी नरेन्द्र मोदी की सरकार को रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने अप्रत्यक्ष रूप से मदद पहुंचाई है। रघुराम राजन की काबिलियत के बारे में तो किसी को भी संदेह नहीं है और दलगत भावना से भी वह परे हैं, इसलिए सरकार उनकी वापसी भी चाहती है। आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने संसदीय आकलन समिति के निर्देश पर अपना पक्ष रखा है और उन्होंने साफ-साफ कहा कि बैंकों के सामने गैर निष्पादित संपत्तियों (एनपीए) की जो समस्या इतनी गहरी हुई है, उसके पीछे पूर्ववर्ती यूपीए सरकार भी है। उन्होंने कहा कि आरबीआई के गवर्नर के सुझाव पर गौर किये बिना ही बैंकों का एकीकरण किया गया। इसके अलावा तत्कालीन यूपीए सरकार के निर्णय लेने की गति बहुत धीमी थी।  इस प्रकार रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने मोदी सरकार का बचाव भी किया है। भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने बढ़ते गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) को लेकर संसद की एक समिति को भेजे अपने जवाब में पूर्ववर्ती यूपीए सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक राजन ने अपने जवाब में कहा है कि घोटालों और जांच की वजह से सरकार के निर्णय लेने की गति धीमी होने की वजह से एनपीए बढ़ते गए।
वरिष्ठ बीजेपी सांसद मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली संसद की प्राक्कलन समिति ने राजन को पत्र लिखकर समिति के सामने उपस्थित होकर एनपीए के मुद्दे पर जानकारी देने को कहा था। अपने जवाब में राजन ने कहा है कि बैंकों द्वारा बड़े कर्जों पर यथोचित कार्रवाई नहीं की गई और 2006 के बाद विकास की गति धीमी पड़ जाने के बाद बैंकों की वृद्धि का जो आकलन था, वो अवास्तविक हो गया। इससे पहले पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) अरविंद सुब्रमण्यम ने एनपीए संकट को पहचानने और इसका हल निकालने का प्रयास करने के लिए समिति के सामने राजन की प्रशंसा की थी। सुब्रमण्यम ने समिति को बताया था कि एनपीए की समस्या को सही तरीके से पहचानने का श्रेय पूर्व गवर्नर रघुराम राजन को जाता है और उनसे बेहतर यह कोई नहीं जानता कि आखिर देश में एनपीए की समस्या कैसे इतनी गंभीर हो गई। इसके अलावा सुब्रमण्यम ने यह दावा किया था कि अपने कार्यकाल के दौरान राजन ने इस समस्या को हल करने की महत्वपूर्ण पहल की थी। इसी के बाद डा. मुरली मनोहर जोशी ने राजन को पत्र लिखकर समिति के सामने उपस्थित होने और उसके सदस्यों को देश में बढ़ते एनपीए के मुद्दे पर जानकारी देने को कहा। सितंबर 2016 तक तीन साल आरबीआई के गवर्नर रहे राजन फिलहाल शिकागो बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में वित्त मामलों के प्रोफेसर हैं। सुब्रमण्यम ने जुलाई में सीईए के नाते समिति के सामने बड़े कर्जों की भरपाई नहीं होने के मुद्दे पर जानकारी रखी थी।
आर्थिक जानकारों का मानना है कि मोदी सरकार एनपीए के मामले को लेकर चिंतित है और उससे बाहर निकलने का रास्ता तलाश रही है। संसदीय आंकलन समिति के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने पूर्व केन्द्रीय रिजर्व बैंक गवर्नर रघुराम राजन को समिति के सामने इसीलिए पेश होने के लिए कहा था। संसदीय समिति देश में गहराते एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग असेट) संकट की जांच कर रही है। समिति के अध्यक्ष ने 7 अगस्त को राजन को पत्र लिखा था और उम्मीद जतायी है कि राजन जल्द ही समिति के सामने पेश होंगे और समिति को एनपीए की समस्या और उससे लड़ने की कोशिशें किस दिशा में बढ़ रही है, पर अपनी राय साझा करेंगे।
रघुराम राजन का रिजर्व बैंक का कार्यकाल सितंबर 2016 में पूरा हुआ था लेकिन केन्द्र सरकार ने उनके कार्यकाल को बढ़ाने की पहल नहीं की थी। इसके चलते रघुराम राजन ने रिजर्व बैंक के कार्यकाल को खत्म करने के बाद अमेरिकी यूनीवर्सिटी में रिसर्च को तरजीह दी और उनके बाद केन्द्र सरकार ने उर्जित पटेल को नया गवर्नर नियुक्त कर दिया। संसदीय आकलन समिति को रघुराम राजन की काबिलियत पर भरोसा है और इसीलिए वह चाहती है कि जल्द से जल्द एनपीए से लड़ने की कोशिशों को सही दिशा दी जाए। खास बात है कि समिति के अध्यक्ष ने राजन से यह भी कहा था कि यदि वह व्यस्तता के चलते जल्द ही समिति के सामने पेश नहीं हो सकते तो वह मामले में अपना पक्ष लिखित तौर पर भी समिति को भेज सकते हैं।मुरली मनोहर जोशी ने अपने पत्र में लिखा था कि रघुराम राजन एनपीए की समस्या पर अपना लिखित वक्तव्य दें और यह भी बताएं कि आखिर कैसे एनपीए की समस्या इतनी गंभीर हो चुकी है और केन्द्र सरकार को इसे काबू करने के लिए किस दिशा में काम करना चाहिए। संसदीय समिति के अध्यक्ष द्वारा राजन को पत्र लिखने का कदम तब उठाया गया जब हाल ही में केन्द्र सरकार के प्रमुख आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने समिति के सामने एनपीए पर अपना पक्ष रखा। सूत्रों का दावा है कि सुब्रमण्यम ने समिति को बताया कि एनपीए की समस्या को सही तरीके से पहचानने का श्रेय पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन को जाता है और उनसे बेहतर यह कोई नहीं जानता कि आखिर देश में एनपीए की समस्या कैसे इतनी गंभीर हो गई। इसके अलावा सुब्रमण्यम ने दावा किया कि अपने कार्यकाल के दौरान राजन ने इस समस्या को हल करने की महत्वपूर्ण पहल की थी। पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने अपने कार्यकाल के दौरान कहा था कि सरकारी बैंकों का विलय करने से पहले उनके नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) के मसले का समाधान किया जाना चाहिए। उनके बही खातों को साफ-सुथरा बनाया जाना चाहिए, ताकि उनकी सेहत में सुधार हो सके और उनके पास पर्याप्त पूंजी हो। राजन के मुताबिक, मेरा मानना है कि बैंकों का निदेशक मंडल सक्रिय हो और उसमें पेशेवर लोग शामिल हों, ताकि उनकी सेहत को फिर से सुधारा जा सके। उन्हें पेशेवर बनाने और उनमें से राजनीतिक हस्तक्षेप दूर करने के लिए लगातार प्रयास किए जाने चाहिए। एक बार हमारे ऐसा कर लेने के बाद बैंकों के विलय के लिए यह एक आदर्श स्थिति होगी। गौरतलब है कि राजन के सुझाव के बावजूद बैंकों के एकीकरण की प्रक्रिया बिना इस सुझाव पर गौर करते हुए की गई। 
 


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