यूपी में फिर भूली कहानी याद आयी
| Agency - 28 Sep 2018

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में ताबड़तोड़  कई महत्वपूर्ण फैसले सुनाए हैं। इनमे चार्जशीट वाले नेताओं को चुनाव लड़ने, पदोन्नति में आरक्षण की जिम्मेदारी राज्यों को सौंपने और आधार कार्ड की कुछ मामलों को छोड़कर अनिवार्यता समाप्त करने के फैसले काफी चर्चित हैं। प्रमोशन में भी आरक्षण का मामला उत्तर प्रदेश की भूली-बिसरी कहानी याद दिला रहा है। इस समय भाजपा की सरकार है और योगी आदित्यनाथ को यह फैसला करना होगा कि राज्य कर्मचारियों को प्रोन्नति में आरक्षण का लाभ दें अथवा न दें। इसके साथ ही समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती के सामने भी असहज स्थिति आ गयी है। सुश्री मायावती ने 2008 मंे अपनी सरकार के दौरान प्रोन्नति में आरक्षण लागू किया था जबकि अखिलेश यादव ने 2012 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद उन अधिकारियों और कर्मचारियों को रिवर्ट कर दिया था जिन्हे मायावती ने प्रमोट किया था। सपा और बसपा के बीच भाजपा के खिलाफ तालमेल हो रहा है और लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियां गठबंधन करके चुनाव लड़ेंगी, तब इस कहानी को ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उस कहानी  को फिर याद दिलाया है। यूपी में गठबंधन के एक घटक कांग्रेस के सामने असमजस की स्थिति है क्योंकि बसपा प्रमुख मायावती ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के दुश्मन अजीत जोगी से समझौता कर लिया है। इसी असमंजस के चलते ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर पांडेय ने पार्टी ही छोड़ दी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं और वे प्रदेशवासियों को गाय पालने की सीख दे रहे हैं।
केन्द्र और राज्य सरकारों में नौकरी कर रहे अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लोगों को पदोन्नति में भी आरक्षण का फायदा मिलेगा, इस बाधा को सुप्रीम कोर्ट ने समाप्त कर दिया है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ही इसे कभी अवैध ठहराया था, इसलिए कोर्ट ने अपनी गर्दन को बचाते हुए यह जिम्मेदारी राज्यों पर डाली है कि वे चाहें तो इसे लागू करें और न चाहें तो न लागू करें। इस फैसले से उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा खुश बसपा प्रमुख मायावती हैं। बसपा सुप्रीमों मायावती ने अपनी प्रतिक्रिया तुरंत दी है और कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की हितैषी बन रही भाजपा को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पदोन्नति में तुरन्त आरक्षण देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से अपने को बचाकर रखा है, उसे मायावती ने भी समझा और कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुछ हद तक स्वागत योग्य है अर्थात् पूरी तरह से स्वागत योग्य नहीं है। मायावती चाहती थीं कि सुप्रीम कोर्ट बाध्यकारी फैसला देता लेकिन उसने राज्यों की इच्छा पर इसे छोड़ दिया। अब प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के सामने दो विकल्प हैं पहला तो यह कि वह सरकार का अधिकार जताते हुए पदोन्नति में आरक्षण लागू करें और इसे अपनी सहूलियत से लागू करें। मसलन कुछ विशेष विभाग इससे अलग रखें अथवा आरक्षण का कोटा अपनी तरह से तय कर लें क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में सिर्फ यही कहा कि पदोन्नति में आरक्षण दिया जा सकता है लेकिन इसका फैसला राज्य करेंगे। दूसरा विकल्प यह है कि योगी सरकार अपनी पूर्ववर्ती सरकारों के फैसले को बहाल रखे। पूर्ववर्ती सपा सरकार ने प्रमोशन में आरक्षण खत्म करते हुए कई लोगों को उनके पूर्व पद पर रिवर्ट भी कर दिया था। इनमे से कुछ सेवानिवृत्त हो चुके हैं और कुछ काम कर रहे होंगे। भाजपा सरकार कह सकती है कि नये सिरे से प्रमोशन में आरक्षण की परम्परा शुरू करने से सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों में हीन भावना पैदा होगी।
भाजपा सरकार के लिए दूसरा रास्ता ज्यादा फायदेमंद दिखता है।  सरकार अगर आरक्षण का यह फार्मूला लागू भी कर देती है, तब भी सुश्री मायावती भाजपा को दलित हितैषी नहीं कहेंगी। इसके विपरीत अखिलेश यादव की सरकार को मानक मानकर योगी सरकार यदि पदोन्नति में आरक्षण नहीं देती है तो एक तरफ सवर्णों का साथ मिलेगा तो दूसरी तरफ पूर्ववर्ती सपा सरकार की लानत-मलामत की जाने लगेगी कि उसने ऐसा कानून क्यों लागू किया था। इसका प्रभाव सपा-बसपा महागठबंधन पर भी पड़ सकता है। मायावती को भी वह भूली-बिसरी कहानी याद करने पर मजबूर होना पड़ेगा क्योंकि दलितों के लाभ में कोई भी बाधा बनेगा, तो मायावती उसे दोषी ठहराएंगी। अभी तो मायावती भाजपा और कांग्रेस को ही इसके लिए दोषी ठहरा रही हैं कि दोनों दलितों का भला नहीं चाहते हैं लेकिन अगर योगी सरकार ने यह दलील दी कि पूर्ववर्ती सरकार ने पदोन्नति में आरक्षण समाप्त कर दिया था तो हमारी सरकार सपा सरकार के फैसले का सम्मान करते हुए पदोन्नति में आरक्षण लागू नहीं करेगी। ऐसे हालात में मायावती को अखिलेश यादव के फैसले की आलोचना करनी ही पड़ेगी, जिससे अब तब सुश्री मायावती बचने का प्रयास करती रही। मायावती कांग्रेस और भाजपा की आलोचना करती हैं, यहां तक कि रालोद और उसके नेता चौधरी  अजित सिंह को भी भरोसेमंद नहीं बतातीं लेकिन समाजवादी पार्टी की आलोचना उन्होंने पूरी तरह से बंद कर रखी है। सपा के वरिष्ठ नेता शिवपाल यादव ने नया मोर्चा बनाया, तब भी बसपा प्रमुख ने कोई प्रतिक्रिया नहीं जतायी। उधर, सपा प्रमुख अखिलेश यादव इसी उधेड़बुन में फंसे थे कि विपक्षी महागठबंधन मंे बसपा और कांग्रेस को कैसे एक साथ रखा जाए। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस का गठबंधन रहा था और पिछले महीनों में लोकसभा उपचुनाव में पहले सपा और बसपा ने ही एकजुट होकर गोरखपुर और फूलपुर की सीटों भाजपा से छीन ली थीं। बाद में कैराना और नूरपुर विधानसभा के उपचुनाव में कांग्रेस और रालोद भी जुड़ गये थे। भाजपा को कैराना लोकसभा सीट पर पराजित करना संभवतः बसपा और सपा के लिए संभव नहीं होता क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद और कांग्रेस का साथ भी जरूरी था। बसपा की कांग्रेस से बढ़ती दूरी अखिलेश यादव के लिए एक समस्या थी, अब प्रोन्नति में आरक्षण का मामला यदि लटक गया तो अखिलेश यादव के लिए एक नयी समस्या खड़ी कर देगा। इन सभी बातों पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नजर तो है लेकिन वे जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं करना चाहते हैं। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं जतायी। वे एक कार्यक्रम में गोवंश की चिंता कर रहे थे और कहते थे कि प्रदेश के सभी लोगों को एक-एक गाय पालना चाहिए। वह कहते हैं कि प्रदेश की 23 करोड़ आबादी है और चार करोड़ गायें। औसतन पांच लोगों पर एक गाय के पालन का दायित्व है। फिलहाल, योगी जी निश्चिंत हैं। 
 


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