आश्वासन के बाद शांत हुए अन्नदाता
| Agency - 03 Oct 2018

किसानों को अपनी जायज मांगों को लेकर एक बार फिर केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलित होना पड़ा। विरोध स्वरूप उन्होंने कुछ घंटों के लिए पूरी दिल्लों को जाम कर दिया। पहली अक्टूबर की शाम लाखों की संख्या में किसानों ने दिल्ली बार्डर पर एकत्र होकर दिल्ली में घुसने की योजना बनाई, लेकिन पुलिस प्रशासन उनके मूवमेंट से पहले से ही वाकिफ था। पूरी तैयारी की हुई थी। सुरक्षा बलों की कई टुकड़ियां पहले से ही तैनात थीं। पैराफोर्स के जवान पूरी तैयारी से किसी भी बड़ी चुनौती से लड़ने के लिए कमर कसे हुए थे। यही वजह है कि किसानों को उन्होंने दिल्ली के भीतर आसानी से नहीं घुसने दिया। लेकिन अगली सुबह यानी मंगलवार को किसान आंदोलित हो गए, जब पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा जिससे कई किसान लहूलुहान हो गए। पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे, पानी की बौछारें शुरू की। हवाई फायर करना पड़ा। 
उत्तर प्रदेश के हजारों किसान कर्ज माफी और बिजली बिल के दाम कम करने जैसी मांगों को लेकर पिछले कुछ महीनों से सरकार से मांग कर रहे हैं। इसी विरोध में उन्होंने पिछले माह की 23 तारीख से हरिद्वार से किसान क्रांति यात्रा निकालनी शुरू की थी। हरिद्वार से चली यह यात्रा यूपी के पश्चिमी जिले मुजफ्फरनगर और मेरठ से होते हुए सोमवार 1 अक्टूबर को गाजियाबाद पहुंची। यहां से यात्रा का अगला पड़ाव दिल्ली था। किसान गांधी जयंती के मौके पर राजघाट से संसद तक मार्च निकालना चाहते थे लेकिन केंद्र सरकार ऐसा नहीं होने दिया। पुलिस ने बल प्रयोग करके उन्हें बीच में रोक दिया।
किसानों का मौजूदा आंदोलन उत्तर प्रदेश के किसानों की समस्याओं को लेकर आयोजित किया गया। किसानों के पूर्व में लिए कर्ज और गन्ना का बकाया भुगतान आदि को लेकर किसान सरकार से समस्या का निदान चाहते हैं। इन सभी मांगों को लेकर किसानों का एक प्रतिनिधित्व मंडल इस सप्ताह उत्तर प्रदेश के सीएम से मिला था लेकिन उनके साथ वार्ता विफल रही है, जिसके बाद किसानों ने दिल्ली कूच करने की योजना बनाई। मंगलवार सुबह जब राष्ट्रीय राजधानी में घुसने की कोशिश कर रहे भारतीय किसान यूनियन के प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस प्रशासन ने दिल्ली-यूपी बॉर्डर के पास आंसू गैस के गोले दागे, तो स्थिति खूनखराबे में तब्दील हो गई। पुलिस की जबरन कार्रवाई से किसान गुस्से में आए तो दोनों तरफ से झड़पे होने लगीं। वैसे किसान अपने नेता राकेश टिकैत के नेतृत्व में कर्ज माफी तथा अन्य मांगों को लेकर दिल्ली में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना चाहते थे लेकिन प्रशासन इसकी इजाजत नहीं देना चाहता था। दो अक्टूबर को महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती मनाई जाती है इसलिए इस विशेष दिन पर सरकार नहीं चाहती थी कि दिल्ली में कोई हो-हंगामा हो।
सरकार चाहती तो मामला शांति से निपट सकता था। किसानों को शांति के साथ आंदोलन करने की इजाजत दे सकती थी लेकिन सरकार को कहीें न कहीं यह लग रहा था कि आंदोलन की आड़ में सियासत शुरू हो जाएगी और विपक्षी पार्टियां भी इस आंदोलन में शामिल होकर केंद्र सरकार की मुखालफत करने से बाज नहीं आएंगी क्योंकि आम चुनाव में ज्यादा समय नहीं बचा। इससे हवा केंद्र सरकार के विपरीत भी बहने लगेगी। और भी कई तरह की सरकार के भीतर शंका-आशंका रही होंगी। कुछ समय के लिए स्थिति सुरक्षा बलों के भी काबू नहीं आ रही थी। पुलिस प्रशासन के दिल्ली सीमा पर रोके जाने का विरोध करते हुए किसानों ने दिल्ली से सटे यूपी गेट पर कब्जा कर लिया और ‘जय जवान जय किसान’ के नारे के साथ किसान उग्र होते चले गए। किसानों ने पुलिस द्वारा लगाए गए बैरिकेट्स पर ट्राली-ट्रैक्टर चढ़ाना शुरू कर दिया। इस पर पुलिस ने पहले उन पर पानी की बौछार करनी शुरू की। स्थिति फिर भी नहीं सुधरी तो आंसू गैस के गोले दागने शुरू कर दिए। पुलिस की इस कार्रवाई से भारतीय किसान क्रांति यात्रा में शामिल सभी किसान उग्र हो गए। तभी सरकार की तरफ से संदेश आ जाता है कि उनके प्रतिनिधि मंडल से गृहमंत्री मिलना चाहते हैं। उनके बुलावे के साथ ही किसान मूवमेंट हल्का पड़ा। 
किसानों की जो मौजूदा मांगे हैं वह कोई नयी नहीं हैं। दशकों से इन मांगों को लेकर किसान आंदोलित होते रहे हैं। देश में करीब ढाई सौ से भी ज्यादा किसान संगठन हैं। अखिल भारतीय किसान समन्वय समिति अपने साथ 203 संगठन होने का दावा करती हैं तो वहीं मौजूदा आंदोलन कर रहे भारतीय किसान यूनियन भानू अपने साथ सवा सौ संगठन होने का दावा कर रहे हैं। अपनी ढपली अपना राग। ये कहावत इस आंदोलन पर सही सिद्ध होती है। कई संगठनों में फूट पड़ चुकी हैं। मांगें तकरीबन सभी की एक जैसी हैं लेकिन रास्ते अलग-अलग अपनाए हुए हैं। अभी जो आंदोलन हुआ उसमें अखिल भारतीय किसान समन्वय समिति शामिल नहीं हुई। इस संगठन के मुखिया सरदार वीएम सिंह कहते हैं कि भानू संगठन में कई लोग सियासत के स्वार्थी हैं। उनका किसानों से कोई लेना देना नहीं। लेकिन हां किसानों की आड़ में अपनी दुकानदारी जरूर चमकाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि किसानों के हितों में आवाज उठाने वालों की बहुत कमी है। किसानों की प्रमुख मांगों की फेहरिस्त फिलहाल लंबी हैं। 60 साल की उम्र के बाद किसानों को मिले पेंशन, पीएम फसल बीमा योजना में बदलाव हो, गन्ना की कीमतों का जल्द भुगतान हो, किसानों का तुरंत कर्जमाफ किया जाए, सिंचाई के लिए बिजली मुफ्त मिले, किसान क्रेडिट कार्ड पर ब्याज मुक्त हो, स्वामीनाथन कमेटी के फार्मूले के आधार पर किसानों की आय तय की जाए, गन्ने की कीमतों के भुगतान में देरी पर ब्याज दिया जाए, के अलावा दस साल पुराने ट्रैक्टर पर प्रतिबंध के आदेश को वापस लिया जाए। ये मांगे हैं जिनको मनवाने के लिए किसान अड़े हैं। फिलहाल इन सभी मांगों पर केंद्र सरकार की ओर से केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने निवास पर किसान नेताओं को बुलाकर उनके साथ बैठक करके आश्वासन दे दिया है। आयोजित हुई बैठक में कृषि राज्यमंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत भी मौजूद रहे। बैठक के बाद शेखावत ने बताया कि किसानों की ज्यादातर मांगों पर सहमति बन गई है लेकिन किसान जनप्रतिनिधि मंडल कोई ठोस आश्वासन चाहता है। अब देखने वाली बात ये होगी कि ये किसानों के लिए चुनावी लाॅलीपाॅप होगा या इस मसले पर ईमानदारी से अमल किया जाएगा। क्योंकि आश्वासन तो पूर्व की सरकारों ने भी किसानों को दिया था जो बाद में भुला दिए गए थे। 
 


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