धार्मिक ही नहीं, सामाजिक है कार्तिक स्नान
| Agency - 25 Oct 2018

वैसे तो स्नान करना हमारे जीवन की परिचायी है। स्नान को एक व्यायाम भी कहा गया है जब हम नहीं, तालाब या स्वीमिंग पूल मंे करते हैं। इस स्नान के समय हम तैरते हैं जिससे शरीर का व्यायाम हो जाता है। स्नान का सीधा संबंध स्वच्छता से है। गांवों मंे पहले यही परम्परा थी कि भोजन करने से पहले लोग स्नान करते थे ताकि पूर्व स्वच्छता से भोजन ग्रहण करें। अब तो रीति-रिवाजों मंे भी परिवर्तन हो गया है। इस स्नान को कार्तिक महीने मंे धर्म-अध्यात्म से जोड़ा गया और पवित्र नदियों, सरोवरों के अतिरिक्त प्रत्येक घर मंे महिलाएं कार्तिक महीने मंे प्रातःकल स्नान करे भोजन बनाती हैं। इसका सिर्फ धार्मिक महत्व ही नहीं है बल्कि सामाजिक रूप से भी इसका महत्व होता है। कृषि प्रधान देश होने के कारण गांवों मंे विशेष रूप से रात के अंतिम पहर से ही किसान खेत जोतने चले जाते थे। किसानों को सबेरे ऐसा न लगे कि वे अकेले काम कर रहे हैं, इसलिए महिलाएं भी सबेरे उठकर स्नान करके तुलसी जी को जल चढ़ाती और इसके बाद नाश्ता-भोजन तैयार करतीं। वर्षा ऋतु समाप्त होने के बाद नदी-तालाबों का हल बहुत स्वच्छ हो जाता है। मिट्टी मंे कीटाणुनाशक गुण होते हैं, इस प्रकार स्वच्छ जल से स्नान करना शरीर को स्वस्थरखने की एक प्रक्रिया भी बन जाता है। मौसम के देवता भी माने गये हैं और कार्तिक स्नान हमारा आस्था का प्रतीक भी बन गया है।
कार्तिक स्नान की पुराणों में बड़ी महिमा कही गई है। कार्तिक मास को स्नान, व्रत व तप की दृष्टि से मोक्ष प्रदान करने वाला बताया गया है। स्कंदपुराण के अनुसार कार्तिक मास में किया गया स्नान व व्रत भगवान विष्णु की पूजा के समान कहा गया है। कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुलसी विवाह और पूर्णिमा को गंगा स्नान किया जाता है। कार्तिक मास में स्नान किस प्रकार किया जाए, इसके संबंध में शास्त्रों में कहा गया है कि कार्तिक व्रती को सर्वप्रथम गंगा, विष्णु, शिव तथा सूर्य का स्मरण कर नदी, तालाब या पोखर के जल में प्रवेश करना चाहिए। उसके बाद नाभिपर्यंत जल में खड़े होकर विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए। गृहस्थ व्यक्ति को काला तिल तथा आंवले का चूर्ण लगाकर स्नान करना चाहिए, परंतु विधवा तथा संन्यासियों को तुलसी के पौधे की जड़ में लगी मृत्तिका को लगाकर स्नान करना चाहिए। सप्तमी, अमावस्या, नवमी, द्वितीया, दशमी व त्रयोदशी को तिल एवं आंवले का प्रयोग वर्जित है। इसके बाद व्रती को जल से निकल कर शुद्ध वस्त्र धारण कर विधि-विधानपूर्वक भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। यह ध्यान रहे कि कार्तिक मास में स्नान व व्रत करने वाले को केवल नरक चतुर्दशी को ही तेल लगाना चाहिए। शेष दिनों में तेल लगाना वर्जित है। कार्तिक मास में प्रातः सूर्योदय से पूर्व स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करना उत्तम फलदायी माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार जो लोग संकल्पपूर्वक पूरे कार्तिक मास में किसी जलाशय में जाकर सूर्योदय से पहले स्नान करके जलाशय के निकट दीपदान करते हैं, उन्हें विष्णु लोक में स्थान मिलता है। लेकिन कई बार ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं कि कार्तिक स्नान का व्रत बीच में ही टूट जाता है अथवा प्रातः उठकर प्रतिदिन स्नान करना संभव नहीं होता है। ऐसी स्थिति में कार्तिक स्नान का पूर्ण फल दिलाने वाला त्रिकार्तिक व्रत है। कार्तिक मास को शास्त्रों में पुण्य मास कहा गया है। पुराणों के अनुसार जो फल सामान्य दिनों में एक हजार बार गंगा नदी में स्नान का होता है तथा प्रयाग में कुंभ के दौरान गंगा स्नान का फल होता है, वही फल कार्तिक माह में सूर्योदय से पूर्व किसी भी नदी में स्नान करने मात्र से प्राप्त हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार कार्तिक मास स्नान की शुरुआत शरद पूर्णिमा से होती है और इसका समापन कार्तिक पूर्णिमा को होता है। पद्म पुराण के अनुसार जो व्यक्ति पूरे कार्तिक माह में सूर्योदय से पूर्व उठकर नदी अथवा तालाब में स्नान करता है और भगवान विष्णु की पूजा करता है, भगवान विष्णु की उन पर असीम कृपा होती है। कथा के अनुसार एक बार कार्तिक मास की महिमा जानने के लिए कुमार कार्तिकेय ने भगवान शिव से पूछा कि कार्तिक मास को सबसे पुण्यदायी मास क्यों कहा जाता है, इस पर भगवान शिव ने कहा कि नदियों में जैसे गंगा श्रेष्ठ है, भगवानों में विष्णु, उसी प्रकार मासों में कार्तिक श्रेष्ठ मास है। इस मास में भगवान विष्णु जल के अंदर निवास करते हैं। इसलिए इस महीने में नदियों एवं तालाब में स्नान करने से विष्णु भगवान की पूजा और साक्षात्कार का पुण्य प्राप्त होता है। भगवान विष्णु ने जब कृष्ण रूप में अवतार लिया था, तब रुक्मिणी और सत्यभामा उनकी पटरानी हुईं। सत्यभामा पूर्व जन्म में एक ब्राह्मण की पुत्री थी। युवावस्था में ही एक दिन इनके पति और पिता को एक राक्षस ने मार दिया। कुछ दिनों तक ब्राह्मण की पुत्री रोती रही। इसके बाद उसने स्वयं को विष्णु भगवान की भक्ति में समर्पित कर दिया। वह सभी एकादशी का व्रत रखती और कार्तिक मास में नियमपूर्वक सूर्योदय से पूर्व स्नान करके भगवान विष्णु और तुलसी की पूजा करती थी। बुढ़ापा आने पर एक दिन जब ब्राह्मण की पुत्री ने कार्तिक स्नान के लिए गंगा में डुबकी लगाई, तब बुखार से कांपने लगी और गंगा तट पर उसकी मृत्यु हो गई। उसी समय विष्णु लोक से एक विमान आया और ब्राह्मण की पुत्री का दिव्य शरीर विमान में बैठकर विष्णु लोक पहुंच गया। कार्तिक के पूरे माह स्नान, दान, दीपदान, तुलसी विवाह, कार्तिक कथा का माहात्म्य आदि सुनना चाहिए। ऐसा करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है व पापों का शमन होता है। पुराणों के अनुसार जो व्यक्ति इस माह में स्नान, दान तथा व्रत करते हैं, उनके पापों का अंत हो जाता है। 
 


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