सिंधिया ने भी तोड़ा भाषा का संयम
| Agency - 19 Nov 2018

चुनाव के समय राजनेता भाषा की मर्यादा तोड़ देते हैं। हालांकि जनता को अब यह समझने मंे कोई भ्रम नहीं रह गया है मंच से एक-दूसरे को अक्षम, झूठा और दगाबाज बताने वाले नेता पर्दे के पीछे आपस मंे हंसते-बतियाते और साथ-साथ खाते-पीते हैं। यह नाटक करना उनकी राजनीति का अंग बन गया है लेकिन भाषा की मर्यादा नहीं तोड़नी चाहिए। मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, नेताओं की बौखलाहट भी सामने आने लगी है। कांग्रेस के चुनाव प्रभारी और मुख्यमंत्री पद के दावेदार ज्योतिरादित्य सिंधिया को साफ-सुथरी राजनीति के लिए जाना जाता था। वे संयमित भाषा का प्रयोग करते थे लेकिन अब लगता है, चुनावी माहौल मंे उन्होंने भी संयम खो दिया है। श्री सिंधिया ने मौजूदा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान को कंस और शकुनी की संज्ञा दी है।
अपने संसदीय क्षेत्र गुना मंे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने गत दिनों मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान पर जोरदार हमला बोला। उन्होंने शिवराज सिंह चैहान की तुलना कंस और शकुनी से की। श्री सिंधिया ने कहा कि शिवराज सिंह चैहान कहते हैं कि वह मामा हैं, भाजपा कहती है कि वह हिन्दू धर्म की एकमात्र रक्षक है। अगर हम इस पर सहमत हो भी जाएं तो धर्मग्रंथों मंे मामा की परिभाषा कंस और शकुनी की है। कंस ने अपने भांजे को मरवाने मंे कोई कसर नहीं छोड़ी और शकुनी ने हस्तिनापुर का नाश करने के लिए सब कुछ किया।
ज्योतिरादित्य के जवाब मंे भाजपा के लोग कह रहे हैं कि कांगे्रेस वाले कंस और शुकनी तक ही क्यों सीमित रह गये। उन्हें कृष्ण और शल्य को भी देखना चाहिए। कृष्ण भी तो अभिमन्यु के मामा थे और शल्य अर्जुन के। इन मामाओं ने तो अपने भांजे का कल्याण ही किया।
 


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